तकनीकी और शैक्षणिक प्रगति के बीच संस्कार, नैतिकता, सामाजिक उत्तरदायित्व और चरित्र-निर्माण की उपेक्षा तो नहीं हो रही?
शिक्षा किसी भी राष्ट्र के भविष्य की सबसे महत्वपूर्ण आधारशिलाओं में से एक है। वह केवल यह निर्धारित नहीं करती कि विद्यार्थी कितना ज्ञान अर्जित करेगा, कितने अंक प्राप्त करेगा या भविष्य में किस व्यवसाय में जाएगा; वह यह भी प्रभावित करती है कि वह किस प्रकार का मनुष्य और नागरिक बनेगा। इसलिए शिक्षा की गुणवत्ता पर चर्चा केवल परीक्षा-परिणामों और रोजगार तक सीमित नहीं हो सकती। हमें यह भी देखना होगा कि शिक्षा विद्यार्थियों में विवेक, आत्मसंयम, नैतिकता, संवेदनशीलता, कर्तव्यबोध और सामाजिक उत्तरदायित्व कितना विकसित कर रही है।
5 सितंबर को भारत में शिक्षक दिवस मनाया जाता है। यह डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन की जयंती से जुड़ा है। लेकिन इस दिन की सार्थकता केवल शिक्षकों को सम्मान देने में नहीं, बल्कि शिक्षक और शिक्षा की वास्तविक भूमिका पर आत्ममंथन करने में भी है।
क्या हमारी शिक्षा सचमुच कमजोर हुई है?
आज यह कहना कि शिक्षा का हर क्षेत्र पहले की तुलना में गिर गया है, तथ्यों के अनुरूप नहीं होगा। विज्ञान, तकनीक और डिजिटल संसाधनों ने शिक्षा के अवसरों का अभूतपूर्व विस्तार किया है। भारत की स्कूली व्यवस्था में 2023-24 में 24.8 करोड़ से अधिक विद्यार्थी और लगभग 98 लाख शिक्षक दर्ज किए गए। (DSEL Education)
बुनियादी सीखने के क्षेत्र में भी तस्वीर केवल निराशाजनक नहीं है। ASER 2024 ने ग्रामीण भारत में 5 से 16 वर्ष के 6.5 लाख से अधिक बच्चों का सर्वेक्षण किया। रिपोर्ट के अनुसार 2022 के बाद पढ़ने और गणित के बुनियादी स्तरों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए, सरकारी विद्यालयों में कक्षा V के उन बच्चों का अनुपात, जो कक्षा II स्तर का पाठ पढ़ सकते थे, 2022 के 38.5 प्रतिशत से बढ़कर 2024 में 44.8 प्रतिशत हुआ।
इसलिए समस्या को केवल “शिक्षा का स्तर गिर रहा है” कहकर समझना उचित नहीं होगा। वास्तविक प्रश्न अधिक गहरा है—
क्या हम शिक्षा की सफलता को केवल मापने योग्य अकादमिक उपलब्धियों से माप रहे हैं?
ज्ञान बढ़ रहा है, पर क्या जीवन-दृष्टि भी विकसित हो रही है?
आज विद्यार्थी के पास सूचना पहले से कहीं अधिक है। इंटरनेट और डिजिटल माध्यम ने दुनिया को उसकी उँगलियों तक पहुँचा दिया है। लेकिन सूचना और विवेक एक ही वस्तु नहीं हैं। ज्ञान और चरित्र भी एक ही बात नहीं हैं।
यहीं शिक्षा के सामने सबसे महत्वपूर्ण चुनौती दिखाई देती है।
यदि कोई विद्यार्थी उच्च अंक प्राप्त कर ले, तकनीकी रूप से दक्ष हो जाए, अच्छी नौकरी प्राप्त कर ले, लेकिन सत्य और असत्य का विवेक न कर पाए, अपने कर्तव्य को न समझे, बड़ों के प्रति सम्मान खो दे, अपने व्यवहार में संयम न रखे और समाज के प्रति उत्तरदायित्व का अनुभव न करे, तो क्या उसकी शिक्षा पूर्ण कही जा सकती है?
UNESCO भी शिक्षा को केवल ज्ञान और कौशल तक सीमित नहीं मानता। शिक्षा के व्यापक उद्देश्य में ज्ञान, कौशल, मूल्य और सामाजिक-भावनात्मक क्षमताएँ भी महत्वपूर्ण हैं। UNESCO के अनुसार सामाजिक और भावनात्मक अधिगम विद्यार्थियों में जिम्मेदार निर्णय लेने, सकारात्मक संबंध बनाने, दूसरों के प्रति संवेदनशीलता विकसित करने तथा सीखने और कल्याण को मजबूत करने में सहायक हो सकता है। (UNESCO)
इससे स्पष्ट है कि संस्कार, सामाजिक व्यवहार और भावनात्मक विकास की चिंता केवल भारतीय परंपरा की चिंता नहीं है; यह आज विश्व-स्तर पर शिक्षा-विमर्श का भी हिस्सा है।
शिक्षक का आचरण स्वयं एक पाठ है
भारतीय चिंतन में शिक्षक का स्थान इसलिए ऊँचा रहा है कि वह केवल पुस्तक का ज्ञान देने वाला व्यक्ति नहीं था। उसका अपना आचरण भी शिक्षा का माध्यम था।
भगवद्गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते हैं—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
— भगवद्गीता 3.21
अर्थात् श्रेष्ठ व्यक्ति जैसा आचरण करता है, दूसरे लोग भी उसका अनुसरण करते हैं।
शिक्षक के संदर्भ में यह श्लोक अत्यंत महत्वपूर्ण है। विद्यार्थी केवल शिक्षक की कही हुई बात नहीं सुनता; वह उसके व्यवहार को भी देखता है। शिक्षक की सत्यनिष्ठा, समयबद्धता, विनम्रता, अनुशासन और विद्यार्थियों के प्रति सम्मान उसके लिए मौन शिक्षा बन जाते हैं।
इसलिए शिक्षक की सफलता का प्रश्न केवल यह नहीं होना चाहिए कि उसने पाठ्यक्रम पूरा किया या नहीं। यह भी पूछा जाना चाहिए कि उसके संपर्क में आने वाले विद्यार्थियों के व्यक्तित्व में क्या परिवर्तन आया।
दोष केवल शिक्षक का नहीं है
यहाँ संतुलन आवश्यक है। शिक्षा की वर्तमान चुनौतियों के लिए केवल शिक्षकों को दोषी ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा। शिक्षक भी एक व्यापक प्रशासनिक और संस्थागत व्यवस्था का हिस्सा हैं।
UNESCO की 2024/25 Global Education Monitoring Report में 14 मध्यम-आय वाले देशों के प्रधानाचार्यों के एक सर्वेक्षण का उल्लेख है, जिसमें उनके समय का 68 प्रतिशत नियमित प्रबंधन कार्यों में खर्च होने की बात सामने आई। यह तथ्य कम-से-कम इतना संकेत देता है कि शिक्षा-प्रशासन में गैर-अध्यापन संबंधी जिम्मेदारियों और शैक्षणिक नेतृत्व के बीच संतुलन एक वास्तविक नीतिगत प्रश्न है।
इसलिए यदि हम शिक्षक से विद्यार्थी के चरित्र और जीवन-निर्माण की अपेक्षा करते हैं, तो उसे पर्याप्त समय, प्रशिक्षण, सम्मान और शैक्षणिक स्वतंत्रता भी देनी होगी।
क्या शिक्षक के मूल्यांकन की नई दृष्टि आवश्यक है?
शिक्षक के कार्य का मूल्यांकन आवश्यक है, लेकिन केवल परीक्षा-परिणाम या कागजी अनुपालन के आधार पर नहीं। एक व्यापक और संतुलित मूल्यांकन व्यवस्था में विद्यार्थियों की सीखने की प्रगति के साथ-साथ कक्षा का वातावरण, शिक्षक-विद्यार्थी संबंध, नियमित उपस्थिति, शिक्षण की गुणवत्ता और विद्यार्थियों का उचित फीडबैक भी शामिल किया जा सकता है।
OECD के PISA अध्ययनों ने भी विद्यालय में विद्यार्थियों के belonging यानी अपनत्व-बोध को सीखने और कल्याण से जोड़कर देखा है। PISA 2018 में मजबूत school belonging वाले विद्यार्थियों का पढ़ने में प्रदर्शन, सामाजिक-आर्थिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखने के बाद भी, औसतन बेहतर पाया गया था।
इससे एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है—
विद्यालय केवल पाठ पढ़ाने की जगह नहीं; वह ऐसा सामाजिक वातावरण भी है जिसमें विद्यार्थी अपने व्यक्तित्व का निर्माण करता है।
गुरुकुल से हमें क्या सीखना चाहिए?
भारत की प्राचीन गुरुकुल व्यवस्था को उसी रूप में आज लागू करना न संभव है, न आवश्यक। समय बदल चुका है, समाज बदल चुका है और ज्ञान के साधन भी बदल चुके हैं।
लेकिन उस परंपरा से कुछ मूल सिद्धांत आज भी लिए जा सकते हैं—ज्ञान के साथ चरित्र, अनुशासन के साथ आत्मसंयम, शिक्षक और विद्यार्थी के बीच जीवंत संबंध, समाज के प्रति उत्तरदायित्व और जीवन को केवल व्यक्तिगत सफलता की दृष्टि से न देखना।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भी शिक्षा के समग्र विकास, सामाजिक-भावनात्मक विकास, मूल्यों और नागरिकता-संबंधी क्षमताओं पर बल देती है।
इसलिए आवश्यकता अतीत में लौटने की नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान-परंपरा के श्रेष्ठ जीवन-मूल्यों को आधुनिक विज्ञान और तकनीक के साथ सार्थक रूप से जोड़ने की है।
अब आगे क्या किया जाए?
शिक्षा में परिवर्तन केवल सरकारी आदेश से नहीं आ सकता। शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, शिक्षाविद्, मनोवैज्ञानिक, समाजशास्त्री, नीति-निर्माता और जागरूक नागरिक—सभी को इसमें भाग लेना होगा।
किसी भी नई व्यवस्था को पूरे देश में तत्काल लागू करने के बजाय पहले कुछ विद्यालयों में उसका प्रयोग किया जा सकता है। विद्यार्थियों और शिक्षकों से स्वतंत्र फीडबैक लिया जाए। परिणामों का वस्तुनिष्ठ मूल्यांकन हो। जहाँ सुधार दिखाई दे, वहाँ उस मॉडल को व्यापक स्तर पर अपनाया जाए।
शिक्षा-नीति में भी यह स्पष्ट किया जाना चाहिए कि शिक्षक का प्राथमिक दायित्व विद्यार्थी का शिक्षण और विकास है। डिजिटल तकनीक का उपयोग प्रशासनिक बोझ कम करने के लिए होना चाहिए, बढ़ाने के लिए नहीं।
शिक्षक दिवस का वास्तविक प्रश्न
शिक्षक दिवस पर हमें केवल शिक्षकों का सम्मान नहीं करना है; हमें शिक्षा के उद्देश्य का भी सम्मान करना है।
शिक्षक अपने हृदय पर हाथ रखकर पूछे—
क्या मैं केवल पाठ पढ़ा रहा हूँ, या अपने विद्यार्थियों को जीवन जीने की दिशा भी दे रहा हूँ?
अभिभावक पूछें—
क्या हम बच्चों को केवल डिग्री दे रहे हैं, या संस्कार और जिम्मेदारी भी दे रहे हैं?
विद्यार्थी पूछें—
क्या मैं अपनी शिक्षा का उपयोग केवल अपने भविष्य के लिए कर रहा हूँ, या परिवार, समाज और राष्ट्र के लिए भी कुछ करने की तैयारी कर रहा हूँ?
और शिक्षा-व्यवस्था स्वयं पूछे—
क्या वह शिक्षक को उसके मूल दायित्व के लिए पर्याप्त समय और अवसर दे रही है?
भगवद्गीता का संदेश आज भी हमें याद दिलाता है कि आचरण स्वयं शिक्षा बन जाता है। यदि शिक्षक ज्ञान के साथ चरित्र का उदाहरण प्रस्तुत करे, परिवार संस्कार का वातावरण दे और विद्यालय विवेक तथा सामाजिक उत्तरदायित्व का विकास करे, तो शिक्षा केवल रोजगार का साधन नहीं रहेगी; वह मनुष्य और राष्ट्र—दोनों के निर्माण की शक्ति बन सकती है।
शिक्षा का अंतिम लक्ष्य केवल यह नहीं कि विद्यार्थी जीवन में सफल हो। उससे बड़ा लक्ष्य यह है कि सफलता प्राप्त करने के बाद भी वह सत्यनिष्ठ, विनम्र, संवेदनशील और उत्तरदायी मनुष्य बना रहे।
शिक्षक दिवस का वास्तविक उत्सव शायद उसी दिन होगा, जब हम यह कह सकेंगे—
हमने अपने बच्चों को केवल शिक्षित नहीं किया; हमने उन्हें मनुष्य बनने की कला भी सिखाई।
के. कृष्णमूर्ति
आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक
श्रीधाम वृन्दावन (भारत)
शोध एवं संदर्भ
- शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार — UDISE+ 2023–24: विद्यालय, विद्यार्थी और शिक्षक संबंधी राष्ट्रीय आँकड़े। (DSEL Education)
- ASER Centre — Annual Status of Education Report 2024: ग्रामीण भारत में बुनियादी पढ़ने और गणितीय क्षमताओं के आँकड़े।
- UNESCO — Education तथा शिक्षा में ज्ञान, कौशल और मूल्यों की भूमिका।
- UNESCO — Social and Emotional Learning in Education Systems. (UNESCO)
- UNESCO Global Education Monitoring Report 2024/5 — Leadership in Education.
- OECD — PISA 2018: Sense of Belonging at School.
- भगवद्गीता 3.21 — Gita Supersite, IIT Kanpur.
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✍️ के. कृष्णमूर्ति
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