जब न्यायिक पहचान का इस्तेमाल विज्ञापन में हो तो कौन देगा जवाब?
एक वीडियो में कथित रूप से High Court के न्यायमूर्ति की पहचान, न्यायिक पोशाक और न्यायालय-सदृश परिवेश के साथ AI-आधारित English-learning ऐप का प्रचार—क्या यह केवल विज्ञापन है, या न्यायपालिका की गरिमा और जनविश्वास से जुड़ा गंभीर प्रश्न?
✍️ के. कृष्णमूर्ति
आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक
श्रीधाम वृन्दावन (भारत)
आज का समय डिजिटल प्रौद्योगिकी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के उस चौराहे पर खड़ा है, जहाँ नवीन संभावनाओं के साथ-साथ नैतिक और संस्थागत मूल्यों के क्षरण का संकट भी गहराता जा रहा है। विज्ञापन आधुनिक बाज़ार व्यवस्था का स्वाभाविक और स्वीकृत हिस्सा हैं। किसी उत्पाद या सेवा का प्रचार कोई कलाकार करे, खिलाड़ी करे या कोई प्रतिष्ठित नागरिक—इस पर सामान्यतः किसी को आपत्ति नहीं हो सकती। परंतु जब किसी व्यावसायिक उत्पाद के विज्ञापन में संवैधानिक पद, उच्च न्यायालय (High Court) का परिवेश, न्यायमूर्ति की पोशाक और नाम की पट्टिका दिखाई देने लगे, तब विषय केवल बाज़ार का नहीं रह जाता। वह सीधे-सीधे न्यायपालिका की संस्थागत गरिमा और उस पर टिके जनविश्वास से जुड़ जाता है।
हाल ही में सोशल मीडिया मंच फ़ेसबुक पर प्रसारित एक वीडियो (रील्स लिंक: https://www.facebook.com/share/r/19Jj53n26d/) ध्यान में आया, जिसमें न्यायालय का पूरा माहौल और खंडपीठ प्रदर्शित हो रही है। इस वीडियो में एक व्यक्ति पारंपरिक न्यायिक पोशाक (न्यायमूर्ति के पूरे आधिकारिक स्वरूप) में न्यायपीठ पर आसीन है, मेज पर “JUSTICE R. S. SHARMA” नाम की पट्टिका रखी हुई है, तथा पृष्ठभूमि में भारत सरकार का राष्ट्रीय प्रतीक (अशोक स्तंभ) एवं “HIGH COURT OF INDIA / भारत का उच्च न्यायालय” का आधिकारिक बोर्ड दृश्यमान है। इस पूरे न्यायिक परिवेश के मध्य वह व्याख्यान प्रस्तुत करते हुए कहता है— “कोर्ट का फैसला बाद में आएगा, पहले अंग्रेजी कैसे सीखें यह जानें।” तत्पश्चात् ‘Supernova’ नामक एक डिजिटल AI-लर्निंग ऐप का व्यावसायिक प्रचार प्रारंभ होता है।
यहाँ प्रश्न उस ऐप की गुणवत्ता या उपयोगिता का बिल्कुल नहीं है। प्रश्न यह है कि क्या भारत में किसी संवैधानिक न्यायिक पद की विश्वसनीयता और न्यायालय के प्रतीकों को किसी निजी कंपनी के मार्केटिंग टूल (Marketing Tool) के रूप में प्रयुक्त किया जा सकता है?
दो गंभीर स्थितियाँ और संवैधानिक यथार्थ
प्रथम स्थिति: यदि वीडियो वास्तविक है
यदि यह वीडियो वास्तविक है और किसी पदधारी न्यायमूर्ति द्वारा व्यावसायिक उत्पाद का प्रचार किया गया है, तो यह स्थापित न्यायिक आचार-मूल्यों की दृष्टि से गंभीर विषय है। सर्वोच्च न्यायालय की Full Court Meeting में 7 मई 1997 को अपनाए गए ‘Restatement of Values of Judicial Life’ में यह मूल सिद्धांत रखा गया है—
“Justice must not merely be done but it must also be seen to be done.”
अर्थात् न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। इस सिद्धांत के अनुसार उच्च न्यायपालिका के सदस्यों का आचरण जनता के न्यायपालिका की निष्पक्षता में विश्वास को सुदृढ़ करने वाला होना चाहिए और ऐसे आचरण से बचना चाहिए जो उस विश्वास को प्रभावित करे।
न्यायिक पद केवल एक सरकारी पद नहीं है। यह जनता के विश्वास से जुड़ी संवैधानिक जिम्मेदारी है। इसलिए न्यायमूर्ति से अपेक्षा की जाती है कि उनका आचरण न्यायपालिका की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और विश्वसनीयता के अनुरूप हो। न्यायिक आचार-मूल्यों में न्यायाधीशों के व्यापार अथवा व्यावसायिक गतिविधियों से दूर रहने की भावना भी स्पष्ट रूप से दिखाई देती है।
द्वितीय स्थिति: यदि वीडियो डीपफेक है
यदि यह वीडियो AI-जनरेटेड, डीपफेक (Deepfake) या डिजिटल रूप से कूटरचित सामग्री है, तो मामला और भी गंभीर हो जाता है। किसी न्यायमूर्ति की पहचान, न्यायिक पोशाक, न्यायालयीय वातावरण और न्यायिक प्रतीकों का कृत्रिम रूप से निर्माण करके उन्हें किसी व्यावसायिक उत्पाद के प्रचार से जोड़ना केवल तकनीकी शरारत नहीं माना जा सकता। यह न्यायपालिका की विश्वसनीयता और आम नागरिक के विश्वास को प्रभावित करने वाला विषय बन सकता है।
ऐसी स्थिति में वीडियो की वास्तविकता, स्रोत, निर्माण और प्रसार की निष्पक्ष तकनीकी जाँच आवश्यक है। लागू कानूनों की प्रासंगिकता भी तथ्यों और आवश्यक कानूनी तत्वों की जाँच के बाद ही निर्धारित की जा सकती है।
भाषायी संतुलन और संवैधानिक प्रावधान
अंग्रेजी आज वैश्विक संवाद की महत्वपूर्ण भाषा है। इसे सीखने पर कोई आपत्ति नहीं हो सकती। भारत के लाखों विद्यार्थी और युवा अंग्रेजी के माध्यम से वैश्विक शिक्षा, विज्ञान, तकनीक और रोजगार के अवसरों से जुड़ रहे हैं। इसलिए अंग्रेजी सीखने के महत्व को नकारना इस प्रश्न का उद्देश्य नहीं है।
लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या न्यायालय जैसे संवैधानिक संस्थान के परिवेश और न्यायिक पहचान का इस्तेमाल किसी निजी भाषा-शिक्षण उत्पाद के प्रचार के लिए किया जाना उचित है? और क्या हमारे सार्वजनिक संस्थानों में भारतीय भाषाओं के प्रति समान सम्मान और संवेदनशीलता दिखाई देती है?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 348(1) सर्वोच्च न्यायालय और प्रत्येक उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों के संबंध में अंग्रेजी भाषा के प्रयोग का संवैधानिक प्रावधान करता है। वहीं अनुच्छेद 348(2) के अंतर्गत राज्यपाल, राष्ट्रपति की पूर्व सहमति से, उच्च न्यायालय की कार्यवाहियों में हिंदी अथवा राज्य के शासकीय प्रयोजनों के लिए प्रयुक्त किसी अन्य भाषा के प्रयोग को अधिकृत कर सकता है। हालांकि, इस उपबंध का उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए निर्णय, डिक्री या आदेश पर उसी रूप में लागू न होने का स्पष्ट प्रावधान है।
अर्थात् भारतीय संविधान स्वयं भाषा के प्रश्न को संवैधानिक व्यवस्था, प्रशासनिक आवश्यकता और भारतीय भाषाओं की वास्तविकता के साथ जोड़कर देखता है। इसलिए इस विषय पर चर्चा अंग्रेजी बनाम भारतीय भाषा के विवाद के रूप में नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा और संतुलित भाषायी दृष्टिकोण के रूप में होनी चाहिए।
संस्थागत उत्तरदायित्व और स्वतः संज्ञान की आवश्यकता
भारत सरकार के न्याय विभाग के अनुसार, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्तियों के आचरण से संबंधित विषयों के लिए न्यायपालिका का अपना स्थापित आंतरिक तंत्र (In-House Mechanism) विद्यमान है। इस व्यवस्था के अनुसार उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश अपने न्यायालय के न्यायाधीशों के आचरण से संबंधित शिकायतों को प्राप्त करने के लिए सक्षम होते हैं, जबकि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संबंध में शिकायतें भारत के मुख्य न्यायाधीश के समक्ष रखी जाती हैं।
साथ ही, उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति को पद से हटाने की संवैधानिक व्यवस्था संविधान के अनुच्छेद 217(1)(b) को अनुच्छेद 124(4) से जोड़कर समझी जाती है। इसलिए किसी शिकायत, आंतरिक जाँच और न्यायमूर्ति को पद से हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया को एक ही प्रक्रिया मानना उचित नहीं होगा।
यदि सामने आया वीडियो वास्तविक है, तो संबंधित न्यायिक संस्था के स्तर पर तथ्यात्मक और संस्थागत जाँच आवश्यक हो सकती है। यदि यह डीपफेक है, तब भी न्यायपालिका और संबंधित सक्षम संस्थाओं के लिए ऐसी सामग्री की सत्यता और स्रोत की जाँच तथा आवश्यक संस्थागत प्रतिक्रिया महत्वपूर्ण हो जाती है।
निष्पक्ष जाँच और नीतिगत दिशा-निर्देश की पुकार
यह विषय केवल एक वीडियो तक सीमित नहीं रहना चाहिए। AI और डीपफेक तकनीक के तेजी से बढ़ते प्रभाव के बीच संवैधानिक संस्थाओं की पहचान और प्रतीकों के दुरुपयोग का प्रश्न भविष्य में और अधिक गंभीर हो सकता है।
इसलिए कुछ बुनियादी प्रश्नों पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए—
- क्या सर्वोच्च न्यायालय अथवा सक्षम न्यायिक प्राधिकरण को इस विषय पर स्वतः संज्ञान लेकर निष्पक्ष और त्वरित तथ्य-जाँच पर विचार नहीं करना चाहिए?
- यदि वीडियो डीपफेक है, तो इसे बनाने और प्रसारित करने वालों के विरुद्ध लागू कानूनों के तहत कार्रवाई और, यदि विधिक तत्व पूरे हों, तो न्यायालय की अवमानना संबंधी प्रावधानों की प्रासंगिकता पर विचार क्यों न हो?
- क्या AI के इस युग में सर्वोच्च न्यायालय और संबंधित डिजिटल नियामकों को न्यायिक पोशाक, न्यायालयीय परिवेश और न्यायमूर्ति की पहचान के भ्रामक अथवा व्यावसायिक उपयोग के संबंध में स्पष्ट दिशा-निर्देशों पर विचार नहीं करना चाहिए?
इन प्रश्नों का उद्देश्य किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना नहीं है। उद्देश्य केवल इतना है कि सत्य सामने आए, संस्थागत गरिमा सुरक्षित रहे और यदि कोई व्यक्ति या संस्था कानून और न्यायिक आचार-मर्यादा का उल्लंघन करती हुई पाई जाए, तो उसके विरुद्ध कानूनसम्मत कार्रवाई हो।
न्याय की गरिमा सबसे ऊपर
न्यायपालिका की शक्ति केवल संविधान के अनुच्छेदों से नहीं, बल्कि उस जनविश्वास से संचालित होती है जो भारत का आम नागरिक उसके प्रति रखता है। न्याय की गरिमा बाज़ार की चकाचौंध से सदैव ऊपर रहनी चाहिए।
न्यायिक पोशाक केवल एक पोशाक नहीं है। न्यायालय का वातावरण केवल एक सजावटी पृष्ठभूमि नहीं है। न्यायमूर्ति का नाम केवल एक पहचान नहीं है। इनके पीछे संविधान, न्याय, निष्पक्षता और करोड़ों नागरिकों का विश्वास जुड़ा हुआ है।
इसलिए इस प्रकार के किसी भी वीडियो के मामले में न तो जल्दबाजी में निष्कर्ष निकालना उचित है और न ही बिना जाँच के उसे सामान्य विज्ञापन मान लेना। सत्य की निष्पक्ष जाँच, प्रमाण के आधार पर निष्कर्ष और दोष सिद्ध होने पर कानूनसम्मत कार्रवाई ही न्याय के प्रति देश के विश्वास को सुदृढ़ कर सकती है।
आज आवश्यकता केवल तकनीकी प्रगति की नहीं, बल्कि ऐसी तकनीकी जिम्मेदारी की भी है जो संविधान, संस्थाओं और समाज के नैतिक मूल्यों का सम्मान करे। न्यायपालिका की गरिमा की रक्षा करना केवल न्यायपालिका का दायित्व नहीं है; यह प्रत्येक नागरिक की सामूहिक जिम्मेदारी है।
के. कृष्णमूर्ति
आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक
श्रीधाम वृन्दावन (भारत)
ईमेल: kkrishnamurti09@gmail.com
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Author: K. Krishnamurti
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