विचार-श्रृंखला : श्रृंखला–2 (11 भागों में)
प्रभु श्रीराम का भव्य मंदिर बन गया, क्या प्रभु श्रीराम हमारे जीवन में भी आए?
यदि प्रभु श्रीराम केवल मंदिरों में विराजमान हों, पर हमारे विचार, आचरण और सार्वजनिक जीवन में उनके आदर्श दिखाई न दें, तो क्या मंदिर-निर्माण अपने वास्तविक उद्देश्य को प्राप्त कर सकता है?
✍ के. कृष्णमूर्ति, श्रीधाम वृन्दावन
लगभग पाँच सौ वर्षों के संघर्ष, असंख्य बलिदानों और करोड़ों श्रद्धालुओं की अटूट आस्था के बाद श्री अयोध्या धाम में प्रभु श्रीराम का दिव्य और भव्य मंदिर स्थापित हुआ। यह केवल स्थापत्य की उपलब्धि नहीं, बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के पुनर्जागरण का ऐतिहासिक क्षण था। करोड़ों लोगों ने इसे अपनी श्रद्धा की विजय माना। परन्तु आज एक प्रश्न प्रत्येक संवेदनशील भारतीय के मन में स्वाभाविक रूप से उठता है—क्या प्रभु श्रीराम केवल मंदिर में आए हैं, या वे हमारे जीवन, हमारे चरित्र और हमारी सार्वजनिक व्यवस्था में भी आए हैं?
यह प्रश्न किसी व्यक्ति, संस्था अथवा व्यवस्था पर आरोप लगाने के लिए नहीं, बल्कि स्वयं का परीक्षण करने के लिए है। क्योंकि किसी राष्ट्र की महानता केवल उसके भव्य मंदिरों, विशाल भवनों या आर्थिक प्रगति से नहीं मापी जाती; उसका वास्तविक स्वरूप उसके नागरिकों के चरित्र, उसकी संस्थाओं की विश्वसनीयता और उसके सार्वजनिक जीवन की नैतिकता से प्रकट होता है। यदि श्रद्धा केवल पूजा तक सीमित रह जाए और व्यवहार तक न पहुँचे, तो उसका प्रभाव अधूरा रह जाता है।
प्रभु श्रीराम का जीवन : धर्म को आचरण में उतारने का आदर्श
प्रभु श्रीराम का जीवन हमें यही सिखाता है कि धर्म केवल उपासना का विषय नहीं, बल्कि जीवन जीने की पद्धति है। सत्य, वचनपालन, न्याय, करुणा, सेवा, उत्तरदायित्व और लोकमंगल—यही उनके चरित्र की आधारशिला हैं। उन्होंने कभी धर्म को बाहरी प्रदर्शन का विषय नहीं बनाया; उसे अपने प्रत्येक निर्णय और प्रत्येक व्यवहार में उतारकर दिखाया। इसी कारण वे केवल एक ऐतिहासिक पुरुष नहीं, बल्कि ‘मर्यादा पुरुषोत्तम’ कहलाए।
इसी सत्य को भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण इन शब्दों में स्पष्ट करते हैं—
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥
(भगवद्गीता 3.21)
अर्थात् श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, सामान्य लोग भी उसी का अनुसरण करते हैं। वह अपने जीवन से जो आदर्श स्थापित करता है, समाज उसी मार्ग पर चलने लगता है।
मंदिर से आगे : जीवन में प्रभु श्रीराम का आगमन
प्रभु श्रीराम का सम्पूर्ण जीवन इस श्लोक का सजीव स्वरूप है। उन्होंने धर्म का उपदेश केवल वाणी से नहीं दिया, बल्कि अपने जीवन से उसे प्रमाणित किया। उनका प्रत्येक निर्णय, प्रत्येक संबंध और प्रत्येक उत्तरदायित्व यह सिखाता है कि समाज का निर्माण उपदेशों से नहीं, आदर्श आचरण से होता है। इसलिए यदि हम प्रभु श्रीराम को केवल मंदिरों तक सीमित रखें और उनके आदर्शों को अपने जीवन में स्थान न दें, तो मंदिर का निर्माण तो होगा, पर उसके पीछे निहित जीवन-दर्शन अधूरा रह जाएगा।
आज हमें स्वयं से एक और प्रश्न पूछना चाहिए। क्या हमने प्रभु श्रीराम को केवल उत्सवों, शोभायात्राओं और मंदिरों तक सीमित कर दिया है? यदि हमारे घरों में सत्य का सम्मान नहीं, यदि हमारे बच्चों को ईमानदारी से अधिक केवल सफल होना सिखाया जा रहा है, यदि सार्वजनिक जीवन में उत्तरदायित्व से अधिक स्वार्थ का महत्व बढ़ रहा है, तो हमें स्वीकार करना होगा कि प्रभु श्रीराम का नाम तो हमारे बीच है, पर उनका चरित्र अभी हमारे जीवन का स्वाभाविक अंग नहीं बन पाया है।
सम्मान का आधार जन्म नहीं, आचरण
प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन से यह भी सिद्ध किया कि मनुष्य की श्रेष्ठता जन्म, पद या संपत्ति से नहीं, बल्कि उसके आचरण से निर्धारित होती है। निषादराज, केवट और माता शबरी के प्रति उनका व्यवहार केवल करुणा का उदाहरण नहीं, बल्कि यह घोषणा भी है कि सम्मान का आधार चरित्र है, जन्म नहीं। यदि आज भारतीय समाज इस एक शिक्षा को व्यवहार में उतार ले, तो अनेक सामाजिक विभाजन स्वतः समाप्त हो सकते हैं।
यही कारण है कि मंदिर निर्माण के साथ-साथ चरित्र निर्माण को भी राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाना होगा। यदि हमारी शिक्षा व्यवस्था, परिवार, धार्मिक संस्थाएँ और सामाजिक संगठन सत्य, सेवा, अनुशासन, उत्तरदायित्व और लोकमंगल के संस्कार विकसित नहीं करेंगे, तो केवल भव्य निर्माणों से आदर्श समाज का निर्माण नहीं होगा। पत्थरों के मंदिर समाज को प्रेरणा दे सकते हैं, पर राष्ट्र का भविष्य चरित्रवान मनुष्यों से ही बनता है।
मंदिर की गरिमा और मनुष्य का चरित्र
वास्तव में किसी भी मंदिर की सबसे बड़ी गरिमा उसकी भव्यता से नहीं, बल्कि उससे जुड़े लोगों के चरित्र से सुरक्षित रहती है। इतिहास बताता है कि जब-जब धर्म का बाहरी स्वरूप उसके आंतरिक मूल्यों से अलग हुआ है, तब समाज में आस्था तो बनी रही, पर विश्वास धीरे-धीरे कमजोर पड़ने लगा। इसलिए आज आवश्यकता केवल देवालयों के विस्तार की नहीं, बल्कि ऐसे व्यक्तित्वों के निर्माण की है, जिनके जीवन में सत्य, ईमानदारी, सेवा और उत्तरदायित्व स्वाभाविक संस्कार बन चुके हों। प्रभु श्रीराम का आदर्श भी यही है कि धर्म पहले मनुष्य के भीतर प्रतिष्ठित हो; तभी वह परिवार, समाज और राष्ट्र के जीवन में स्थायी रूप से प्रतिष्ठित हो सकता है।
श्री अयोध्या धाम का मंदिर हमें प्रतिदिन यह स्मरण कराता है कि प्रभु श्रीराम का वास्तविक सम्मान केवल उनके चरणों में पुष्प अर्पित करने से नहीं, बल्कि उनके आदर्शों को अपने जीवन में स्थान देने से होगा। जब परिवारों में सत्य का वातावरण बनेगा, शिक्षा चरित्र का निर्माण करेगी, धार्मिक संस्थाएँ सेवा और पारदर्शिता का उदाहरण बनेंगी तथा सार्वजनिक जीवन में नैतिकता पुनः प्रतिष्ठित होगी, तभी हम कह सकेंगे कि प्रभु श्रीराम केवल मंदिर में ही नहीं, हमारे जीवन में भी आए हैं।
मंदिर : अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य की दिशा
आज आवश्यकता किसी नए आंदोलन की नहीं, बल्कि एक नए आत्मजागरण की है। श्री अयोध्या धाम का मंदिर केवल अतीत की स्मृति नहीं, भविष्य की दिशा भी है। यदि हम इस अवसर को केवल उत्सव तक सीमित रख देंगे, तो उसका प्रभाव क्षणिक रहेगा। पर यदि इसे चरित्र, संस्कार और राष्ट्रीय पुनर्जागरण का आधार बना देंगे, तो यह मंदिर आने वाली पीढ़ियों के लिए केवल आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि जीवन का आदर्श भी बन जाएगा।
प्रभु श्रीराम के जीवन का सबसे बड़ा संदेश यही है कि धर्म का सर्वोच्च स्वरूप मनुष्य के आचरण में प्रकट होता है। इसलिए आज सबसे बड़ी आवश्यकता मंदिरों की संख्या बढ़ाने से पहले ऐसे मनुष्यों की संख्या बढ़ाने की है, जिनके जीवन में सत्य, मर्यादा, सेवा और उत्तरदायित्व स्वाभाविक संस्कार बन चुके हों। जिस दिन यह परिवर्तन प्रारम्भ होगा, उसी दिन श्री अयोध्या धाम का यह ऐतिहासिक मंदिर केवल स्थापत्य की उपलब्धि नहीं रहेगा; वह राष्ट्रीय चरित्र-जागरण का भी शाश्वत प्रतीक बन जाएगा। तभी श्री अयोध्या धाम का यह ऐतिहासिक मंदिर भारतीय संस्कृति की उस मर्यादा का सजीव प्रतीक बनेगा, जिसकी स्थापना प्रभु श्रीराम ने अपने जीवन से की थी। यही उस ऐतिहासिक निर्माण की वास्तविक सफलता होगी।
क्रमशः…
श्रृंखला–3 : “प्रभु श्रीराम ने जैसा समाज बनाया, क्या हम वैसा समाज बना पाए?”
✍ के. कृष्णमूर्ति
आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक
श्रीधाम वृन्दावन (भारत)
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✍️ के. कृष्णमूर्ति
श्रीधाम वृंदावन
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