श्रीधाम वृंदावन की पावन धरती पर सवाल: क्या ब्रज की लीला-भूमि मनोरंजन का मंच बनेगी?


✍ के. कृष्णमूर्ति, श्रीधाम वृन्दावन


श्रीधाम वृंदावन—यह नाम मात्र उच्चारण नहीं है, यह भारतीय चेतना का एक जीवंत मंत्र है। यह वही पावन ब्रज-भूमि है जहाँ परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने साक्षात चरणों से धरती को स्पर्श किया, जहाँ की वायु, कण-कण और रज में आज भी उनकी लीला-स्मृति व्याप्त है। यह भूमि केवल एक धार्मिक तीर्थ नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम, त्याग, तपस्या और ईश्वर-समर्पण की वैश्विक राजधानी रही है। मां यमुना की अविरल धारा, श्री गोवर्धन की अडिग छाया, श्री राधारानी का बरसाना और श्री बांके बिहारी लाल का आलोक—ये सब मिलकर वृंदावन को संसार की उस दुर्लभ भूमि में स्थापित करते हैं जहाँ जीवन के इस लोक और परलोक—दोनों के लिए मार्गदर्शन मिलता है।


इसी पावनता के बीच आज एक गंभीर और चिंताजनक प्रश्न उभर कर सामने आया है। नववर्ष 2026 के शुभारंभ में ब्रजमंडल की इस ऐतिहासिक लीला-भूमि पर ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की चर्चा सामने आई है, जिनका स्वरूप और उद्देश्य वृंदावन की आध्यात्मिक गरिमा से मेल नहीं खाता। विशेष रूप से एक चर्चित कलाकार—सनी लियोन—के नाम से जुड़ी प्रस्तुतियों का आयोजन, वह भी ऐसे संदर्भ में जहाँ बच्चों का प्रवेश तक वर्जित बताया जाता है, ब्रज की सांस्कृतिक चेतना को भीतर तक झकझोर देता है।


यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रश्न किसी कलाकार की व्यक्तिगत गरिमा या जीवन-चयन पर नहीं है। सनी लियोन स्वयं एक कलाकार हैं और उनका अपना पेशेवर संसार है। किंतु प्रश्न उस स्थान का है, उस भूमि का है, जिसकी पहचान केवल मनोरंजन नहीं बल्कि आध्यात्मिक शुचिता रही है। जब ब्रज जैसी पावन भूमि पर ऐसे आयोजनों का विचार किया जाता है, तब दोष कलाकार से अधिक उन आयोजकों और उस मानसिकता पर जाता है, जो इस धरती की आत्मा को समझने में असफल रही है।


ब्रजमंडल की यह भूमि किसी मंचीय नुमाइश के लिए नहीं, बल्कि साधना और प्रेम की लीला के लिए जानी जाती है। यहाँ का हर कण श्रीहरि की स्मृति से आलोकित है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या धन, प्रदर्शन और क्षणिक आकर्षण के लिए इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर की मर्यादा को धूमिल किया जा सकता है? क्या स्वयं को हिंदू या सनातनी कहने वाले लोग इस बात पर गंभीर आत्ममंथन करेंगे कि वृंदावन की पावनता के साथ ऐसा व्यवहार उचित है या नहीं?


श्रीधाम वृंदावन की संस्कृति और सभ्यता आज मानो मौन होकर गुहार लगा रही है—यदि कोई इसकी परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक नहीं बन सकता, तो क्या उसे इसे विकृत करने का अधिकार है? यह भूमि सदियों से विश्व को प्रेम और करुणा का पाठ पढ़ाती आई है। यहाँ की आत्मा बाजार की भाषा नहीं समझती, वह केवल भक्ति, मर्यादा और साधना की भाषा जानती है।


आज आवश्यकता है कि समाज, विशेषकर ब्रजमंडल में रहने वाले लोग और नीति-निर्माता, एक क्षण रुककर अपने अंतःकरण से प्रश्न करें। यदि कोई व्यक्ति एकांत में, अपने हृदय पर हाथ रखकर, श्रीधाम वृंदावन की पावनता को स्मरण करते हुए स्वयं से पूछे कि क्या इस लीला-भूमि पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन होना चाहिए—तो उत्तर शायद स्वतः ही स्पष्ट हो जाएगा। यह प्रश्न केवल वृंदावन का नहीं, बल्कि उस भारत का है, जिसकी आत्मा सनातन मूल्यों में बसती है।


✍ के. कृष्णमूर्ति
आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक
श्रीधाम वृन्दावन (भारत)

संपर्क : +91 7677184040
E: kkrishnamurti09@gmail.com


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