जब पर्यावरण केवल चर्चा का विषय बन जाए और जीवन का आधार होने का बोध कमजोर पड़ जाए, तब मानव सभ्यता स्वयं अपने भविष्य को संकट में डालने लगती है।
विश्व पर्यावरण दिवस प्रत्येक वर्ष आता है और उसके साथ अनेक कार्यक्रम, संगोष्ठियाँ, वृक्षारोपण अभियान तथा जागरूकता गतिविधियाँ भी दिखाई देती हैं। यह सब आवश्यक है, परंतु एक गंभीर प्रश्न हमारे सामने खड़ा होता है—क्या पर्यावरण संरक्षण केवल एक दिवस मनाने का विषय है, अथवा यह पूरे वर्ष अपने आचरण, जीवनशैली और सामाजिक उत्तरदायित्व का मूल्यांकन करने का अवसर है?
यदि हम गंभीरता से विचार करें, तो पाएँगे कि पर्यावरण कोई बाहरी विषय नहीं है। यह हमारे अस्तित्व का आधार है। जिस वायु को हम प्रत्येक क्षण ग्रहण करते हैं, जिस जल से हमारा जीवन चलता है, जिस भूमि से हमारा अन्न उत्पन्न होता है, जिन वृक्षों से हमें छाया, फल, औषधि और प्राणवायु प्राप्त होती है, वे सभी हमारे जीवन के मौन संरक्षक हैं।
जन्म से लेकर जीवन की अंतिम साँस तक मनुष्य प्रकृति पर निर्भर रहता है। इसलिए पर्यावरण संरक्षण कोई अलग विषय नहीं, बल्कि स्वयं अपने जीवन की रक्षा का विषय है।
उपभोग का संसाधन बनाम कृतज्ञता का भाव
विडम्बना यह है कि जिसके बिना मानव जीवन एक दिन भी संभव नहीं है, उसी पर्यावरण के प्रति हम उतने उत्तरदायी नहीं दिखाई देते जितना होना चाहिए। हम प्रकृति से निरंतर लेते रहते हैं, पर उसके प्रति कृतज्ञता और संरक्षण का भाव उतनी गंभीरता से विकसित नहीं कर पाते।
परिणामस्वरूप प्रदूषण, जल-संकट, वनों का क्षरण, जैव-विविधता का ह्रास और जलवायु असंतुलन जैसी चुनौतियाँ विश्व के सामने खड़ी हैं।
भारतीय संस्कृति की विशेषता यह रही है कि उसने पर्यावरण को केवल संसाधन के रूप में नहीं देखा। यहाँ नदियाँ केवल जलधाराएँ नहीं रहीं, बल्कि माँ गंगा, माँ यमुना और माँ सरस्वती के रूप में सम्मानित हुईं। पर्वत केवल भू-आकृतियाँ नहीं रहे, बल्कि हिमालय को देवतुल्य सम्मान मिला। अनेक प्रदेशों को देवभूमि कहा गया, जिससे वहाँ रहने वाले लोगों के भीतर प्रकृति और जीवन के प्रति श्रद्धा और उत्तरदायित्व का भाव विकसित हो।
वनवासी परंपरा और प्रकृति का गहरा संबंध
भारत के अनेक वनवासी और जनजातीय समुदाय आज भी प्रकृति को अपना सर्वस्व मानते हैं। वे वृक्षों, पर्वतों, नदियों और वनों को केवल प्राकृतिक संसाधन नहीं, बल्कि ईश्वर की अभिव्यक्ति के रूप में देखते हैं।
अनेक स्थानों पर वृक्षों की पूजा की जाती है, नदियों को माता के रूप में सम्मान दिया जाता है और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है। यह केवल धार्मिक परंपरा नहीं है, बल्कि मनुष्य और प्रकृति के बीच गहरे संबंध का जीवंत उदाहरण है। आधुनिक समाज इस दृष्टि से बहुत कुछ सीख सकता है।
भगवद्गीता का संदेश: प्रकृति में ईश्वरीय विभूति
भगवान श्रीकृष्ण ने भी Bhagavadgita में प्रकृति और पर्यावरण के प्रति सम्मान का अत्यंत गहरा संदेश दिया है। वे दसवें अध्याय के छब्बीसवें श्लोक में अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं:
“अश्वत्थः सर्ववृक्षाणां…” — Bhagavadgita 10.26
अर्थात — वृक्षों में मैं पीपल हूँ।
इसी प्रकार वे इकतीसवें श्लोक में पवन की पवित्रता को रेखांकित करते हुए कहते हैं:
“पवनः पवतामस्मि…” — Bhagavadgita 10.31
अर्थात — पवित्र करने वालों में मैं पवन हूँ।
भगवान श्रीकृष्ण का यह संदेश केवल आध्यात्मिक प्रतीक नहीं है। इसका एक अत्यंत व्यावहारिक पक्ष भी है। जब वे वृक्ष, वायु, नदी, समुद्र, सूर्य और हिमालय जैसे पर्यावरण के महत्त्वपूर्ण अंगों को अपनी विभूतियों के रूप में प्रस्तुत करते हैं, तब वे अप्रत्यक्ष रूप से मनुष्य को यह शिक्षा देते हैं कि प्रकृति का सम्मान करो, क्योंकि वही जीवन का आधार है।
वासुदेवः सर्वमिति: सार्वभौमिक चेतना का जागरण
Bhagavadgita के सातवें अध्याय के उन्नीसवें श्लोक में भगवान कहते हैं कि अनेक जन्मों के पश्चात ज्ञानी पुरुष यह अनुभव करता है कि सम्पूर्ण सृष्टि ही वासुदेव यानी उस परम सत्ता की अभिव्यक्ति है:
“बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥” — Bhagavadgita 7.19
यदि मनुष्य इस भाव को समझ ले, तो पर्यावरण संरक्षण केवल सरकारी योजना या सामाजिक अभियान नहीं रहेगा, बल्कि जीवन-दृष्टि का स्वाभाविक भाग बन जाएगा।
व्यावहारिक परिवर्तन और आत्ममंथन
आज आवश्यकता केवल वृक्ष लगाने की नहीं, बल्कि वृक्षों को बचाने की है। केवल जल संरक्षण की चर्चा करने की नहीं, बल्कि जल के प्रति अनुशासन विकसित करने की है। केवल पर्यावरण दिवस मनाने की नहीं, बल्कि पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाने की है। जब तक हमारे व्यवहार में परिवर्तन नहीं आएगा, तब तक कार्यक्रमों की संख्या बढ़ने के बावजूद अपेक्षित परिणाम प्राप्त नहीं होंगे।
संभव है कि ईश्वर के स्वरूप को लेकर लोगों के विचार भिन्न हों, पर एक सत्य ऐसा है जिसे कोई भी नकार नहीं सकता। इस पृथ्वी पर प्रत्येक जीव का जीवन पर्यावरण पर ही आधारित है। हमारा भोजन, हमारा जल, हमारी वायु, हमारा स्वास्थ्य और हमारा अस्तित्व—सब कुछ प्रकृति से जुड़ा हुआ है।
इसी प्रकार, पर्यावरण संरक्षण केवल प्रकृति के प्रति दया नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति कृतज्ञता है जो निरंतर हमारे जीवन का पोषण कर रही है।
निष्कर्ष: मानवता के भविष्य की रक्षा
विश्व पर्यावरण दिवस का वास्तविक उद्देश्य एक दिन का आयोजन नहीं, बल्कि पूरे वर्ष के अपने आचरण का लेखा-जोखा लेना है। हमें स्वयं से यह प्रश्न पूछना चाहिए कि पिछले एक वर्ष में हमने पर्यावरण संरक्षण के लिए क्या किया? क्या हमने जल बचाया? क्या हमने वृक्षों की रक्षा की? क्या हमने प्रदूषण कम करने का प्रयास किया? क्या हमने आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रकृति को बेहतर बनाने में कोई योगदान दिया?
यदि इस दिवस पर हम अपने भीतर यह संकल्प विकसित कर सकें कि प्रकृति को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन के आधार के रूप में समझेंगे, तो यही इस दिवस की सबसे बड़ी सार्थकता होगी। क्योंकि पर्यावरण की रक्षा करना अंततः मानवता के भविष्य की रक्षा करना ही है।
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✍️ के. कृष्णमूर्ति
आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक
श्रीधाम वृन्दावन
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