वैशà¥à¤µà¤¿à¤• अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤• दिवस (1 जून) पर à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ जीवन-दरà¥à¤¶à¤¨, संसà¥à¤•ारों की निरंतरता और नैतिक उतà¥à¤¤à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¤¿à¤¤à¥à¤µ के मूल ततà¥à¤µà¥‹à¤‚ को टटोलता à¤à¤• गंà¤à¥€à¤° वैचारिक विमरà¥à¤¶à¥¤
आज 1 जून को विशà¥à¤µ के अनेक देशों में ‘वैशà¥à¤µà¤¿à¤• अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤• दिवस’ मनाया जाता है। इस अवसर पर माता-पिता और अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤•ों के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ समà¥à¤®à¤¾à¤¨, कृतजà¥à¤žà¤¤à¤¾ और पà¥à¤°à¥‡à¤® वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤ करने की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ दी जाती है। निसà¥à¤¸à¤‚देह यह à¤à¤• अचà¥à¤›à¥€ à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ है।
परंतॠà¤à¤• पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨ सà¥à¤µà¤¾à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤• रूप से मन में उठता है—कà¥à¤¯à¤¾ वासà¥à¤¤à¤µ में वरà¥à¤· में à¤à¤• दिन अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤• दिवस मना लेने से अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤•ों के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ समà¥à¤®à¤¾à¤¨ बढ़ जाà¤à¤—ा? कà¥à¤¯à¤¾ किसी संबंध की गहराई केवल à¤à¤• दिवस के सहारे जीवित रह सकती है? और कà¥à¤¯à¤¾ हमारी à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति की परंपरा à¤à¥€ यही रही है?
à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति में अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤•तà¥à¤µ का वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤• सà¥à¤µà¤°à¥‚प
इन पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨à¥‹à¤‚ पर गंà¤à¥€à¤°à¤¤à¤¾ से विचार करने पर सà¥à¤ªà¤·à¥à¤Ÿ होता है कि à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति की दृषà¥à¤Ÿà¤¿ कहीं अधिक वà¥à¤¯à¤¾à¤ªà¤•, गहरी और जीवनोपयोगी रही है। यहाठअà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤• का अरà¥à¤¥ केवल माता-पिता तक सीमित नहीं है।
दादा-दादी, नाना-नानी, गà¥à¤°à¥, परिवार के वरिषà¥à¤ जन तथा वे सà¤à¥€ लोग जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने हमारे जीवन के निरà¥à¤®à¤¾à¤£, संरकà¥à¤·à¤£ और मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤¨ में à¤à¥‚मिका निà¤à¤¾à¤ˆ है, à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ परंपरा में अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤• माने गठहैं। हमारे यहाठसंबंध केवल रकà¥à¤¤ से नहीं, संसà¥à¤•ार और उतà¥à¤¤à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¤¿à¤¤à¥à¤µ से बनते हैं।
तैतà¥à¤¤à¤¿à¤°à¥€à¤¯à¥‹à¤ªà¤¨à¤¿à¤·à¤¦à¥ का यह पà¥à¤°à¤¸à¤¿à¤¦à¥à¤§ वचन à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति की आतà¥à¤®à¤¾ को पà¥à¤°à¤•ट करता है—
“मातृदेवो à¤à¤µà¥¤ पितृदेवो à¤à¤µà¥¤ आचारà¥à¤¯à¤¦à¥‡à¤µà¥‹ à¤à¤µà¥¤â€ — तैतà¥à¤¤à¤¿à¤°à¥€à¤¯à¥‹à¤ªà¤¨à¤¿à¤·à¤¦à¥, शिकà¥à¤·à¤¾à¤µà¤²à¥à¤²à¥€, अनà¥à¤µà¤¾à¤• 11 (1.11.2)
अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤â€” माता को देवतà¥à¤²à¥à¤¯ समà¤à¥‹, पिता को देवतà¥à¤²à¥à¤¯ समà¤à¥‹ और आचारà¥à¤¯ को देवतà¥à¤²à¥à¤¯ समà¤à¥‹à¥¤
जिस संसà¥à¤•ृति ने माता, पिता और गà¥à¤°à¥ को देवतà¥à¤²à¥à¤¯ सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ दिया हो, वहाठसमà¥à¤®à¤¾à¤¨ किसी à¤à¤• दिवस का विषय नहीं था। वहाठतो जीवन का पà¥à¤°à¤¤à¥à¤¯à¥‡à¤• दिन कृतजà¥à¤žà¤¤à¤¾ का अवसर माना जाता था।
आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता की दौड़ और सांसà¥à¤•ृतिक जड़ों का संकट
दà¥à¤°à¥à¤à¤¾à¤—à¥à¤¯ से आज हम धीरे-धीरे अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। यह केवल यà¥à¤µà¤¾à¤“ं का दोष नहीं है। जिस पीढ़ी को अपनी संसà¥à¤•ृति का परिचय ही नहीं कराया गया, उससे उसके संरकà¥à¤·à¤£ की अपेकà¥à¤·à¤¾ कैसे की जा सकती है?
यदि बचà¥à¤šà¥‹à¤‚ को आधà¥à¤¨à¤¿à¤• जà¥à¤žà¤¾à¤¨ दिया जाà¤, पर अपनी परंपराओं का परिचय न दिया जाà¤, तो वे सà¥à¤µà¤¾à¤à¤¾à¤µà¤¿à¤• रूप से बाहरी पà¥à¤°à¤à¤¾à¤µà¥‹à¤‚ की ओर आकरà¥à¤·à¤¿à¤¤ होंगे।
आज अनेक यà¥à¤µà¤¾ आधà¥à¤¨à¤¿à¤• पहचान में गरà¥à¤µ अनà¥à¤à¤µ करते हैं। इसमें कोई बà¥à¤°à¤¾à¤ˆ नहीं है। समसà¥à¤¯à¤¾ आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता नहीं है; समसà¥à¤¯à¤¾ तब उतà¥à¤ªà¤¨à¥à¤¨ होती है जब आधà¥à¤¨à¤¿à¤•ता के आकरà¥à¤·à¤£ में हम अपनी पहचान à¤à¥‚लने लगते हैं।
जिस वृकà¥à¤· की जड़ें कमजोर हो जाà¤à¤, उसकी हरियाली अधिक समय तक नहीं टिकती। यही बात समाज और संसà¥à¤•ृति पर à¤à¥€ लागू होती है।
शिकà¥à¤·à¤¾ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ और चरितà¥à¤° निरà¥à¤®à¤¾à¤£ की चà¥à¤¨à¥Œà¤¤à¥€
सबसे गंà¤à¥€à¤° चिंता यह है कि आज परिवार, शिकà¥à¤·à¤¾ और समाज—तीनों कà¥à¤·à¥‡à¤¤à¥à¤°à¥‹à¤‚ में संसà¥à¤•ारों की निरंतरता कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। शिकà¥à¤·à¤¾ का उदà¥à¤¦à¥‡à¤¶à¥à¤¯ जीवन निरà¥à¤®à¤¾à¤£ के सà¥à¤¥à¤¾à¤¨ पर केवल जीविका तक सीमित होता जा रहा है।
विदà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ और विशà¥à¤µà¤µà¤¿à¤¦à¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯ कà¥à¤¶à¤² विदà¥à¤¯à¤¾à¤°à¥à¤¥à¥€ तो तैयार कर रहे हैं, पर कà¥à¤¯à¤¾ वे उतनी ही गंà¤à¥€à¤°à¤¤à¤¾ से चरितà¥à¤°à¤µà¤¾à¤¨, संवेदनशील और कृतजà¥à¤ž मनà¥à¤·à¥à¤¯ à¤à¥€ तैयार कर रहे हैं? यह पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨ केवल शिकà¥à¤·à¤•ों के लिठनहीं, पूरे समाज के लिठविचारणीय है।
à¤à¤—वान शà¥à¤°à¥€à¤•ृषà¥à¤£ à¤à¤—वदà¥à¤—ीता में कहते हैं—
“देवदà¥à¤µà¤¿à¤œà¤—à¥à¤°à¥à¤ªà¥à¤°à¤¾à¤œà¥à¤žà¤ªà¥‚जनं शौचमारà¥à¤œà¤µà¤®à¥à¥¤ बà¥à¤°à¤¹à¥à¤®à¤šà¤°à¥à¤¯à¤®à¤¹à¤¿à¤‚सा च शारीरं तप उचà¥à¤¯à¤¤à¥‡à¥¥â€ — शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥à¤à¤—वदà¥à¤—ीता 17.14
अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤â€” देवता, गà¥à¤°à¥à¤œà¤¨ और पूजनीय वà¥à¤¯à¤•à¥à¤¤à¤¿à¤¯à¥‹à¤‚ का समà¥à¤®à¤¾à¤¨ करना शारीरिक तप है।
यदि समà¥à¤®à¤¾à¤¨ और कृतजà¥à¤žà¤¤à¤¾ को तप कहा गया है, तो अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤•ों के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ आदर का महतà¥à¤µ सहज ही समà¤à¤¾ जा सकता है। परंतॠआज समà¥à¤®à¤¾à¤¨ धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलता दिखाई दे रहा है। संबंध बने हà¥à¤ हैं, पर उनके à¤à¥€à¤¤à¤° की आतà¥à¤®à¥€à¤¯à¤¤à¤¾ कमजोर पड़ रही है।
मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤¨ की सà¥à¤µà¥€à¤•ारà¥à¤¯à¤¤à¤¾ और विधिक-नैतिक करà¥à¤¤à¤µà¥à¤¯
à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति ने संबंधों को केवल सामाजिक वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾ नहीं माना, बलà¥à¤•ि जीवन के नैतिक और आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• विकास का आधार माना है। गोसà¥à¤µà¤¾à¤®à¥€ तà¥à¤²à¤¸à¥€à¤¦à¤¾à¤¸ जी लिखते हैं—
“मातॠपिता गà¥à¤°à¥ पà¥à¤°à¤à¥ कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सà¥à¤ जानी॥†— शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥à¤°à¤¾à¤®à¤šà¤°à¤¿à¤¤à¤®à¤¾à¤¨à¤¸, बालकाणà¥à¤¡, दोहा 76, दà¥à¤µà¤¿à¤¤à¥€à¤¯ चौपाई
यहाठमाता-पिता, गà¥à¤°à¥ और पूजनीय जनों के मारà¥à¤—दरà¥à¤¶à¤¨ को जीवन के कलà¥à¤¯à¤¾à¤£à¤•ारी आधार के रूप में सà¥à¤µà¥€à¤•ार करने की पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾ दी गई है।
आज आवशà¥à¤¯à¤•ता किसी दिवस का विरोध करने की नहीं है। आवशà¥à¤¯à¤•ता इस बात की है कि हम अपनी संसà¥à¤•ृति के मूल à¤à¤¾à¤µ को समà¤à¥‡à¤‚। यदि à¤à¤• दिन का अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤• दिवस हमें कृतजà¥à¤žà¤¤à¤¾ का सà¥à¤®à¤°à¤£ कराता है, तो उसका सà¥à¤µà¤¾à¤—त होना चाहिà¤à¥¤ परंतॠयह à¤à¤¾à¤µà¤¨à¤¾ वरà¥à¤· के केवल à¤à¤• दिन तक सीमित नहीं रहना चाहिà¤à¥¤
शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥à¤à¤¾à¤—वत महापà¥à¤°à¤¾à¤£ में कहा गया है—
“आचारà¥à¤¯à¤‚ मां विजानीयानà¥à¤¨à¤¾à¤µà¤®à¤¨à¥à¤¯à¥‡à¤¤ करà¥à¤¹à¤¿à¤šà¤¿à¤¤à¥à¥¤â€ — शà¥à¤°à¥€à¤®à¤¦à¥à¤à¤¾à¤—वत महापà¥à¤°à¤¾à¤£, सà¥à¤•नà¥à¤§ 11, अधà¥à¤¯à¤¾à¤¯ 17, शà¥à¤²à¥‹à¤• 27
अरà¥à¤¥à¤¾à¤¤â€” आचारà¥à¤¯ को मेरा ही सà¥à¤µà¤°à¥‚प समà¤à¤¨à¤¾ चाहिठऔर कà¤à¥€ उनका अनादर नहीं करना चाहिà¤à¥¤
यह शिकà¥à¤·à¤¾ केवल गà¥à¤°à¥ के लिठनहीं, बलà¥à¤•ि उन सà¤à¥€ लोगों के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ शà¥à¤°à¤¦à¥à¤§à¤¾ का संदेश है जिनà¥à¤¹à¥‹à¤‚ने हमारे जीवन को दिशा दी है।
आतà¥à¤®à¤šà¤¿à¤‚तन और à¤à¤µà¤¿à¤·à¥à¤¯ का मारà¥à¤—
समय आ गया है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को केवल आधà¥à¤¨à¤¿à¤• साधन ही नहीं, बलà¥à¤•ि अपनी संसà¥à¤•ृति का परिचय à¤à¥€ दें। उनà¥à¤¹à¥‡à¤‚ बताया जाठकि à¤à¤¾à¤°à¤¤à¥€à¤¯ संसà¥à¤•ृति केवल अतीत की सà¥à¤®à¥ƒà¤¤à¤¿ नहीं है; यह जीवन जीने की à¤à¤• परिपकà¥à¤µ पदà¥à¤§à¤¤à¤¿ है। यह कृतजà¥à¤žà¤¤à¤¾, संवेदना, परिवार, सेवा, समà¥à¤®à¤¾à¤¨ और उतà¥à¤¤à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¤¿à¤¤à¥à¤µ की संसà¥à¤•ृति है।
सतà¥à¤¯ यह है कि दोष केवल यà¥à¤µà¤¾à¤“ं का नहीं है। यदि बचà¥à¤šà¥‡ अपनी संसà¥à¤•ृति से दूर हो रहे हैं, तो इसके लिठअà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤•, शिकà¥à¤·à¤¾ वà¥à¤¯à¤µà¤¸à¥à¤¥à¤¾, सामाजिक वातावरण और आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• नेतृतà¥à¤µâ€”सà¤à¥€ को आतà¥à¤®à¤šà¤¿à¤‚तन करना होगा। नई पीढ़ी वही सीखेगी जो हम उसे देंगे।
यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीठियाठअपने अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤•ों, परिवार और समाज के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ उतà¥à¤¤à¤°à¤¦à¤¾à¤¯à¥€ बनें, तो हमें अपने घरों, विदà¥à¤¯à¤¾à¤²à¤¯à¥‹à¤‚ और सामाजिक जीवन में पà¥à¤¨à¤ƒ उन मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚ को जीवित करना होगा जो हमारी सà¤à¥à¤¯à¤¤à¤¾ की पहचान रहे हैं।
कà¥à¤¯à¥‹à¤‚कि किसी राषà¥à¤Ÿà¥à¤° की वासà¥à¤¤à¤µà¤¿à¤• शकà¥à¤¤à¤¿ उसकी आरà¥à¤¥à¤¿à¤• समृदà¥à¤§à¤¿ से पहले उसके संसà¥à¤•ारित परिवारों में निहित होती है। और संसà¥à¤•ारित परिवारों की शà¥à¤°à¥à¤†à¤¤ अà¤à¤¿à¤à¤¾à¤µà¤•ों के पà¥à¤°à¤¤à¤¿ समà¥à¤®à¤¾à¤¨, कृतजà¥à¤žà¤¤à¤¾ और आतà¥à¤®à¥€à¤¯à¤¤à¤¾ से होती है।
पाठकों हेतॠआतà¥à¤®à¥€à¤¯ संदेश
🌎 यदि यह संदेश आपके à¤à¥€à¤¤à¤° सतà¥à¤¯, विवेक और आतà¥à¤®à¤šà¤¿à¤‚तन का à¤à¤¾à¤µ जगा सके, तो इसे केवल पढ़कर न छोड़ें—इसे जीवन में उतारने का पà¥à¤°à¤¯à¤¾à¤¸ करें। à¤à¤¸à¥‡ विचारों, अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨ और संवाद से जà¥à¤¡à¤¼à¥‡ रहना आवशà¥à¤¯à¤• है, जो मनà¥à¤·à¥à¤¯ को उसके जीवन-मूलà¥à¤¯à¥‹à¤‚, संसà¥à¤•ारों और सतà¥à¤¯ मारà¥à¤— से जोड़ते हैं।
à¤à¤—वदà¥à¤—ीता, जीवन-दरà¥à¤¶à¤¨, चरितà¥à¤°-निरà¥à¤®à¤¾à¤£, आधà¥à¤¯à¤¾à¤¤à¥à¤®à¤¿à¤• चिंतन तथा समसामयिक विषयों पर नियमित अधà¥à¤¯à¤¯à¤¨-सामगà¥à¤°à¥€, पà¥à¤°à¤¶à¥à¤¨à¥‹à¤¤à¥à¤¤à¤°à¥€ à¤à¤µà¤‚ पà¥à¤°à¥‡à¤°à¤£à¤¾à¤¦à¤¾à¤¯à¤• विचारों के लिà¤:
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