
विश्व का आध्यात्मिक केंद्र, भगवान श्री कृष्ण की दिव्य लीला भूमि—श्रीधाम वृंदावन—आज जिस स्थिति से गुजर रहा है, वह केवल एक धाम की नहीं, हमारी चेतना की स्थिति को प्रकट करता है। बाहर से आने वाले लोग दर्शन करें, यह आवश्यक है—परंतु क्या वे भाव लेकर आ रहे हैं, या केवल प्रवृत्तियाँ?
भगवान श्री कृष्ण ने गौ माता और बृजवासियों से जो प्रेम किया, वही इस धाम की आत्मा है। अतः जो भी यहाँ आए, वह केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि श्रद्धा और सम्मान के साथ आए। परंतु आज जब व्यवहार में ही वह भाव कम होता दिखाई दे, तो यह एक गंभीर संकेत है।
और इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब संत समाज के भीतर ही चरित्र, आध्यात्मिकता और नैतिकता में गिरावट दिखाई देने लगे। क्योंकि तीर्थ की महिमा उसके स्थान से नहीं, बल्कि वहाँ के आचरण से जीवित रहती है। यदि आधार ही कमजोर हो जाए, तो दिव्यता केवल शब्द बनकर रह जाती है।
यह समय केवल देखने का नहीं, बल्कि जागने का है। जो भी इस धाम से जुड़े हैं—चाहे संत हों, बृजवासी हों या श्रद्धालु—सभी को अपनी भूमिका को समझना होगा।
आज वरुथिनी एकादशी के इस पावन अवसर पर ठाकुर श्री बांके बिहारी लाल जी महाराज के चरणों में यही प्रार्थना है कि वे अपनी कृपा से इस दिव्य ब्रजधाम की पवित्रता, उसकी मर्यादा और उसकी आध्यात्मिक चेतना की रक्षा करें, और हम सभी को ऐसा भाव दें कि हम इस धाम को केवल देखें नहीं, बल्कि उसके अनुरूप जीने का प्रयास करें।
यह केवल वृंदावन का प्रश्न नहीं—यह उस भाव का प्रश्न है, जिससे हम ईश्वर के धाम को देखते और जीते हैं।
🌎 यदि यह संदेश आपके भीतर किसी शांत जागरण को स्पर्श करता है, तो आप इस सतत आध्यात्मिक, सामाजिक और प्रेरणादायक विचार-प्रवाह से जुड़ सकते हैं।
नित्य भगवद्गीता प्रश्नोत्तरी के माध्यम से इस अनुभूति को और गहराई दी जा सकती है —
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Spiritual
क्या मनुष्य धीरे-धीरे अपने श्रेष्ठ मानव जीवन का मूल्य भूलता जा रहा है…? | सनातन शास्त्रों से दूरी और भटकती पीढ़ी पर गंभीर चिंतन
(चौरासी लाख योनियों की लंबी यात्रा के बाद मिला यह दुर्लभ मानव जीवन आखिर किस उद्देश्य के लिए है? जानिए कैसे अपने सनातन शास्त्रों से दूर होकर आज का मनुष्य बाहर से जितना आधुनिक दिख रहा है, भीतर से उतना ही खोखला, भयभीत और दिशाहीन होता जा रहा है।) आधुनिक मनुष्य और भूलता हुआ वास्तविक उद्देश्य क्या वास्तव में आज के आधुनिक मनुष्य को यह स्मरण रह गया है कि इस धरती पर उसे सबसे श्रेष्ठ चेतना और दुर्लभ जीवन प्राप्त हुआ है…? या फिर आधुनिकता, भौतिकता और झूठे दिखावे की अंधी दौड़ में वह धीरे-धीरे अपने ही वास्तविक स्वरूप, अपने महान संस्कार और जीवन के परम उद्देश्य से बहुत दूर होता जा रहा है? इस धरती का सबसे विकसित, संवेदनशील और चेतनशील जीव केवल मनुष्य है। परमात्मा ने संपूर्ण चराचर जगत में केवल मनुष्य को ही वह ‘विवेक’ प्रदान किया है, जिससे वह सत्य और असत्य, धर्म और अधर्म, उचित और अनुचित, तथा करुणा और क्रूरता के बीच का अंतर समझ सके। पशु और पक्षी केवल अपनी मूल प्रवृत्तियों (आहार, निद्रा, भय और मैथुन) के अधीन होकर जीवन जीते हैं; उनके पास अपने कर्मों को चुनने या बदलने की स्वतंत्रता नहीं है। केवल मनुष्य ही वह प्राणी है जो अपने कर्मों का निर्माता स्वयं है। यही कारण है कि मानव जीवन को सभी योनियों में सर्वश्रेष्ठ और मुकुटमणि माना गया है। परंतु आज हर विचारशील व्यक्ति के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यही खड़ा होता है कि यदि मनुष्य वास्तव में इतना श्रेष्ठ और विवेकी है, तो फिर हमारी वर्तमान मानवीय सभ्यता दिन-प्रतिदिन भीतर से इतनी कमजोर, हिंसक, अस्थिर और दिशाहीन क्यों होती जा रही है? चौरासी लाख योनियों का गहरा संकेत हमारी सनातन ज्ञान परंपरा और शास्त्रों में यह स्पष्ट उल्लेख मिलता है कि चौरासी लाख योनियों के सुदीर्घ भटकाव और संघर्ष के बाद यह मानव जीवन प्राप्त होता है। आधुनिक युग में सतही चिंतन करने वाले अनेक लोग इस विषय पर अलग-अलग मत रख सकते हैं, पर जब हम इस सृष्टि के रहस्य को दार्शनिक और वैज्ञानिक गहराई से देखते हैं, तो यह संकेत अत्यंत गहरा प्रतीत होता है। जलचर, थलचर, पक्षी, वृक्ष, वनस्पतियाँ, सूक्ष्म जीव और अनगिनत प्रकार की जीवन-शृंखलाएँ — यह समस्त सृष्टि इस बात का साक्षात अनुभव कराती है कि मानव जीवन केवल एक साधारण जैविक घटना नहीं है, बल्कि यह चेतना के क्रमिक विकास की अत्यंत उच्च और अंतिम अवस्था है। पद्म पुराण का महत्वपूर्ण वर्णन “जलजा नव-लक्षाणि स्थावरा लक्ष-विंशति। कृमयो रुद्र-संख्यकाः पक्षिणां दश-लक्षणम्॥ त्रिंशल्लक्षाणि पशवः चतुर्-लक्षाणि मानवाः॥” (पद्म पुराण, उत्तर खण्ड, अध्याय 229, श्लोक 40–41) अर्थात — जलचर (जल में रहने वाले जीव) नौ लाख, स्थावर (पेड़-पौधे आदि) बीस लाख, कृमि-कीट (कीड़े-मकोड़े) ग्यारह लाख, पक्षी दस लाख, पशु तीस लाख और मानव चार लाख प्रकार के बताए गए हैं। यह वर्णन केवल जातियों या प्रजातियों की संख्या का गणितीय विवरण मात्र नहीं है। यह इस बात का अत्यंत गंभीर संकेत भी है कि एक आत्मा को जलचर से लेकर पशु योनि तक कितना लंबा और अंधकारमय पथ तय करना पड़ता है। इतने लंबे संघर्ष के बाद प्राप्त होने वाला यह मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ और चेतना की एक महत्वपूर्ण अवस्था है। यदि इसे केवल धन कमाने, खाने-पीने और सोने में नष्ट कर दिया जाए, तो इससे बड़ा दुर्भाग्य और कोई नहीं हो सकता। भगवद्गीता का स्पष्ट संदेश “उद्धरेदात्मनाऽत्मानं नात्मानमवसादयेत्। आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥” (भगवद्गीता 6.5) अर्थात — मनुष्य स्वयं (अपने विवेक और पुरुषार्थ से) अपना उत्थान करे, स्वयं को कभी अधोगति या पतन में न डाले। क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना सबसे बड़ा मित्र है और स्वयं ही अपना सबसे बड़ा शत्रु भी है। श्रीमद्भागवत का हृदयस्पर्शी संदेश “लब्ध्वा सुदुर्लभमिदं बहुसंभवान्ते मानुष्यमर्थदमनित्यमपीह धीरः। तूर्णं यतेत न पतेदनुमृत्यु यावन्- निःश्रेयसाय विषयः खलु सर्वतः स्यात्॥” (श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 11, अध्याय 9, श्लोक 29) अर्थात — अनेक जन्मों के भटकाव के बाद प्राप्त यह मानव जीवन अत्यंत दुर्लभ और कल्याणकारी है। यद्यपि यह जीवन स्थायी नहीं है (मृत्यु निश्चित है), फिर भी एक बुद्धिमान मनुष्य को मृत्यु आने से पहले अपने इस बहुमूल्य जीवन को सत्य की खोज, आत्मकल्याण और श्रेष्ठ मार्ग में लगाने का तत्काल प्रयास करना चाहिए। आधुनिकता के बीच भीतर से टूटता हुआ मनुष्य यही मानव जीवन का सबसे बड़ा सत्य है। मनुष्य चाहे तो अपने विवेक, सनातन संस्कार और उच्च चेतना से स्वयं को देवत्व की उच्चतम अवस्था तक पहुँचा सकता है, और चाहे तो अपने ही निकृष्ट कर्मों और अहंकार से स्वयं को भयानक पतन की ओर भी ले जा सकता है। आज समाज के प्रबुद्ध वर्ग के लिए सबसे अधिक चिंता की बात यह है कि इतना महान और दुर्लभ मानव जीवन प्राप्त होने के बाद भी, आज का मनुष्य अपने जीवन के मूल उद्देश्य से पूरी तरह भटकता जा रहा है। बाहर से देखने पर विज्ञान, तकनीक, चिकित्सा और सुख-सुविधाएँ बहुत तेजी से बढ़ रही हैं, पर भीतर से मनुष्य उतना ही अस्थिर, तनावग्रस्त और अवसाद से घिरा हुआ होता जा रहा है। सनातन शास्त्रों से बढ़ती दूरी इस भयावह स्थिति का एक सबसे बड़ा और मूल कारण यह है कि धीरे-धीरे हमारे घरों, परिवारों और विद्यालयों से हमारे सनातन शास्त्र दूर होते जा रहे हैं। भगवद्गीता, रामचरितमानस, उपनिषद और श्रीमद्भागवत महापुराण जैसे महान दिव्य ग्रंथ, जो कभी हमारे दैनिक जीवन-निर्माण, चरित्र, संकट के समय धैर्य, विवेक और आत्मचिंतन का सबसे बड़ा आधार हुआ करते थे; आज दुर्भाग्य से अनेक घरों में केवल लाल कपड़े में बंधकर पूजा-घर की अलमारी तक सीमित होकर रह गए हैं। उनका स्वाध्याय बंद हो गया है। धर्म के नाम पर बढ़ता बाहरी प्रदर्शन यह भी एक बड़ा दुर्भाग्य है कि आज धर्म और अध्यात्म के क्षेत्र में भी आंतरिक पवित्रता से अधिक बाहरी प्रदर्शन हावी दिखाई दे रहा है। वास्तविक शास्त्रीय चिंतन, गहरा आत्ममंथन और जीवन का निर्माण करने वाला सच्चा सत्संग धीरे-धीरे लुप्त होता जा रहा है। आज समाज का एक बड़ा वर्ग केवल भारी भीड़, वेशभूषा, चमत्कार और बाहरी प्रभाव को ही अध्यात्म समझने की भूल कर रहा है। आने वाली पीढ़ियों के सामने सबसे बड़ा संकट विचार कीजिए, यदि हम अपनी आने वाली पीढ़ियों को केवल गलाकाट प्रतियोगिता, उपभोग की लालसा, मशीनें और बाहरी आधुनिकता ही सौंपेंगे, पर उन्हें जीवन के शाश्वत सत्य, सनातन संस्कार, बड़ों के प्रति कृतज्ञता और आत्मिक चेतना से नहीं जोड़ेंगे, तो हमारा यह समाज बाहर से कितना भी विकसित क्यों न हो जाए, भीतर से वह पूरी तरह खोखला और मृतप्राय हो जाएगा। समाधान क्या है? आज हमें आधुनिक विज्ञान या तकनीक के किसी अंध-विरोध की आवश्यकता नहीं है, बल्कि सत्य को सत्य की तरह बेबाकी से स्वीकार करने की आवश्यकता है। आज की सबसे बड़ी माँग अपनी मूल सनातन संस्कृति, अपने शास्त्रों और अपने शाश्वत जीवन मूल्यों की ओर पुनः लौटने की है। आत्मचिंतन का समय अभी भी शेष है यदि आज का मनुष्य वास्तव में अपने मानव जीवन की इस दुर्लभ श्रेष्ठता और 84 लाख योनियों के इस विज्ञान को गहराई से समझ ले, तो वह केवल स्वयं ही नहीं बदलता — बल्कि उसका पूरा परिवार, उसका समाज और उसकी आने वाली पीढ़ियाँ भी एक नई दिशा और नया प्रकाश प्राप्त करने लगती हैं। इसलिए, हम सभी के पास अभी भी समय है — अपनी इस अंधी दौड़ में थोड़ा ठहरकर आत्मचिंतन करने का, अपनी महान ऐतिहासिक और पौराणिक जड़ों को पहचानने का, और असत्य के अंधकार को चीरकर सत्य मार्ग पर चलने का अदम्य साहस करने का। दैनिक आध्यात्मिक चिंतन से जुड़ें यदि यह वैचारिक संदेश आपके भीतर सत्य, विवेक और आत्मचिंतन का कोई भाव जगा सका है, तो इसे केवल पढ़कर भूल न जाएँ। इसे अपने दैनिक जीवन और आचरण में उतारने का दृढ़ संकल्प लें। समाज के प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह ऐसे सतत आध्यात्मिक एवं चरित्र-निर्माण करने वाले विचारों से स्वयं को जोड़े, जो मनुष्य को उसकी सनातन जड़ों, उसके संस्कारों और भगवद्गीता के सत्य मार्ग से जोड़ते हैं। नित्य भगवद्गीता प्रश्नोत्तरी हेतु: 👉 https://www.youtube.com/@KrishnamurtiKOfficial लेखक परिचय ✍ के. कृष्णमूर्ति आध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतक श्रीधाम वृन्दावन (भारत) 📞 संपर्क : +91 7677184040 ✉ E: kkrishnamurti09@gmail.com ©️ Copyright Notice ©️ 2026 K. Krishnamurti. All Rights Reserved. यह लेख पूर्ण रूप से मौलिक, शोधपूर्ण एवं कॉपीराइट संरक्षित बौद्धिक संपत्ति है। लेखक की पूर्व लिखित अनुमति के बिना इस लेख का पूर्ण या आंशिक पुनर्प्रकाशन, संपादन, अनुवाद, प्रतिलिपि (Copy), डिजिटल प्रसारण, AI प्रशिक्षण (AI Training), सोशल मीडिया प्रसार, वेबसाइट प्रकाशन अथवा किसी भी प्रिंट, डिजिटल या अन्य माध्यम में उपयोग पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है। इस लेख को किसी अन्य नाम, संस्था, समाचारपत्र, पत्रिका, मंच या माध्यम से प्रकाशित करना भारतीय कॉपीराइट अधिनियम के अंतर्गत विधिक (कानूनी) कार्यवाही के अधीन होगा। Original Author: K. KrishnamurtiOfficial Website: kkrishnamurti.in
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May 27, 2026
Spiritual
श्रीधाम वृंदावन—दिव्यता की भूमि या हमारी चेतना की परीक्षा?
विश्व का आध्यात्मिक केंद्र, भगवान श्री कृष्ण की दिव्य लीला भूमि—श्रीधाम वृंदावन—आज जिस स्थिति से गुजर रहा है, वह केवल एक धाम की नहीं, हमारी चेतना की स्थिति को प्रकट करता है। बाहर से आने वाले लोग दर्शन करें, यह आवश्यक है—परंतु क्या वे भाव लेकर आ रहे हैं, या केवल प्रवृत्तियाँ? भगवान श्री कृष्ण ने गौ माता और बृजवासियों से जो प्रेम किया, वही इस धाम की आत्मा है। अतः जो भी यहाँ आए, वह केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि श्रद्धा और सम्मान के साथ आए। परंतु आज जब व्यवहार में ही वह भाव कम होता दिखाई दे, तो यह एक गंभीर संकेत है। और इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब संत समाज के भीतर ही चरित्र, आध्यात्मिकता और नैतिकता में गिरावट दिखाई देने लगे। क्योंकि तीर्थ की महिमा उसके स्थान से नहीं, बल्कि वहाँ के आचरण से जीवित रहती है। यदि आधार ही कमजोर हो जाए, तो दिव्यता केवल शब्द बनकर रह जाती है। यह समय केवल देखने का नहीं, बल्कि जागने का है। जो भी इस धाम से जुड़े हैं—चाहे संत हों, बृजवासी हों या श्रद्धालु—सभी को अपनी भूमिका को समझना होगा। आज वरुथिनी एकादशी के इस पावन अवसर पर ठाकुर श्री बांके बिहारी लाल जी महाराज के चरणों में यही प्रार्थना है कि वे अपनी कृपा से इस दिव्य ब्रजधाम की पवित्रता, उसकी मर्यादा और उसकी आध्यात्मिक चेतना की रक्षा करें, और हम सभी को ऐसा भाव दें कि हम इस धाम को केवल देखें नहीं, बल्कि उसके अनुरूप जीने का प्रयास करें। यह केवल वृंदावन का प्रश्न नहीं—यह उस भाव का प्रश्न है, जिससे हम ईश्वर के धाम को देखते और जीते हैं। 🌎 यदि यह संदेश आपके भीतर किसी शांत जागरण को स्पर्श करता है, तो आप इस सतत आध्यात्मिक, सामाजिक और प्रेरणादायक विचार-प्रवाह से जुड़ सकते हैं। नित्य भगवद्गीता प्रश्नोत्तरी के माध्यम से इस अनुभूति को और गहराई दी जा सकती है —https://www.youtube.com/@Krishnamurti… ✍️ के. कृष्णमूर्ति, श्रीधाम वृन्दावन
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April 22, 2026
Spiritual
क्या हर श्वास श्री हरि के स्मरण से जुड़ सकती है?
क्या हर श्वास श्री हरि के स्मरण से जुड़ सकती है? जब जीवन का प्रत्येक कर्म भगवान को समर्पित हो जाता है, तब भक्ति सहज हो जाती है। भगवद्गीता का यही सरल संदेश है— “यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत्।यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्॥” (9.27) अर्थात—जो कुछ भी हम करें, उसे ईश्वर को अर्पित कर दें—यही जीवन को सफल बनाने का मार्ग है। 🌎 यदि यह संदेश आपके भीतर जागरण की भावना उत्पन्न करता है, तो आइए—आध्यात्मिक, सामाजिक और प्रेरणादायक विचारों के इस सतत प्रवाह से जुड़ें, तथा नित्य भगवद्गीता प्रश्नोत्तरी में सहभागी बनें —👉 https://www.youtube.com/@Krishnamurti…
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April 18, 2026
Spiritual
श्रीधाम वृंदावन की पावन धरती पर सवाल: क्या ब्रज की लीला-भूमि मनोरंजन का मंच बनेगी?
✍ के. कृष्णमूर्ति, श्रीधाम वृन्दावन श्रीधाम वृंदावन—यह नाम मात्र उच्चारण नहीं है, यह भारतीय चेतना का एक जीवंत मंत्र है। यह वही पावन ब्रज-भूमि है जहाँ परब्रह्म परमेश्वर श्रीकृष्ण ने अपने साक्षात चरणों से धरती को स्पर्श किया, जहाँ की वायु, कण-कण और रज में आज भी उनकी लीला-स्मृति व्याप्त है। यह भूमि केवल एक धार्मिक तीर्थ नहीं, बल्कि निस्वार्थ प्रेम, त्याग, तपस्या और ईश्वर-समर्पण की वैश्विक राजधानी रही है। मां यमुना की अविरल धारा, श्री गोवर्धन की अडिग छाया, श्री राधारानी का बरसाना और श्री बांके बिहारी लाल का आलोक—ये सब मिलकर वृंदावन को संसार की उस दुर्लभ भूमि में स्थापित करते हैं जहाँ जीवन के इस लोक और परलोक—दोनों के लिए मार्गदर्शन मिलता है। इसी पावनता के बीच आज एक गंभीर और चिंताजनक प्रश्न उभर कर सामने आया है। नववर्ष 2026 के शुभारंभ में ब्रजमंडल की इस ऐतिहासिक लीला-भूमि पर ऐसे कार्यक्रमों के आयोजन की चर्चा सामने आई है, जिनका स्वरूप और उद्देश्य वृंदावन की आध्यात्मिक गरिमा से मेल नहीं खाता। विशेष रूप से एक चर्चित कलाकार—सनी लियोन—के नाम से जुड़ी प्रस्तुतियों का आयोजन, वह भी ऐसे संदर्भ में जहाँ बच्चों का प्रवेश तक वर्जित बताया जाता है, ब्रज की सांस्कृतिक चेतना को भीतर तक झकझोर देता है। यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि प्रश्न किसी कलाकार की व्यक्तिगत गरिमा या जीवन-चयन पर नहीं है। सनी लियोन स्वयं एक कलाकार हैं और उनका अपना पेशेवर संसार है। किंतु प्रश्न उस स्थान का है, उस भूमि का है, जिसकी पहचान केवल मनोरंजन नहीं बल्कि आध्यात्मिक शुचिता रही है। जब ब्रज जैसी पावन भूमि पर ऐसे आयोजनों का विचार किया जाता है, तब दोष कलाकार से अधिक उन आयोजकों और उस मानसिकता पर जाता है, जो इस धरती की आत्मा को समझने में असफल रही है। ब्रजमंडल की यह भूमि किसी मंचीय नुमाइश के लिए नहीं, बल्कि साधना और प्रेम की लीला के लिए जानी जाती है। यहाँ का हर कण श्रीहरि की स्मृति से आलोकित है। ऐसे में यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि क्या धन, प्रदर्शन और क्षणिक आकर्षण के लिए इस ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर की मर्यादा को धूमिल किया जा सकता है? क्या स्वयं को हिंदू या सनातनी कहने वाले लोग इस बात पर गंभीर आत्ममंथन करेंगे कि वृंदावन की पावनता के साथ ऐसा व्यवहार उचित है या नहीं? श्रीधाम वृंदावन की संस्कृति और सभ्यता आज मानो मौन होकर गुहार लगा रही है—यदि कोई इसकी परंपरा को आगे बढ़ाने में सहायक नहीं बन सकता, तो क्या उसे इसे विकृत करने का अधिकार है? यह भूमि सदियों से विश्व को प्रेम और करुणा का पाठ पढ़ाती आई है। यहाँ की आत्मा बाजार की भाषा नहीं समझती, वह केवल भक्ति, मर्यादा और साधना की भाषा जानती है। आज आवश्यकता है कि समाज, विशेषकर ब्रजमंडल में रहने वाले लोग और नीति-निर्माता, एक क्षण रुककर अपने अंतःकरण से प्रश्न करें। यदि कोई व्यक्ति एकांत में, अपने हृदय पर हाथ रखकर, श्रीधाम वृंदावन की पावनता को स्मरण करते हुए स्वयं से पूछे कि क्या इस लीला-भूमि पर ऐसे कार्यक्रमों का आयोजन होना चाहिए—तो उत्तर शायद स्वतः ही स्पष्ट हो जाएगा। यह प्रश्न केवल वृंदावन का नहीं, बल्कि उस भारत का है, जिसकी आत्मा सनातन मूल्यों में बसती है। ✍ के. कृष्णमूर्तिआध्यात्मिक एवं सामाजिक चिंतकश्रीधाम वृन्दावन (भारत) संपर्क : +91 7677184040E: kkrishnamurti09@gmail.com 🔹 नित्य भगवद्गीता प्रश्नोत्तरी, राष्ट्र, संस्कृति, धर्म, शिक्षा और चरित्र-निर्माण से जुड़े गहन विचार—जहाँ केवल सूचना नहीं, चेतना का संवाद होता है। यदि ये प्रश्न आपको भीतर तक स्पर्श करते हैं, तो इस विचार-यात्रा में सहभागी बनने के लिए YouTube चैनल से अवश्य जुड़ें 👉https://www.youtube.com/@Krishnamurti…
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April 17, 2026
Spiritual
लोगों को नहीं, श्रीहरि को प्रसन्न करें
क्या सचमुच ऐसा कोई उपाय है, जिससे जीवन में कोई भी हमसे अप्रसन्न न हो?यदि यह संभव है, तो उसका आधार बाहर नहीं — हमारे भीतर है। क्या मनुष्य अपने जीवन में अपने मित्र, बंधु, प्रेमी, परिवार और समाज—सभी को सदा प्रसन्न रख सकता है? यह प्रश्न अत्यंत गहरा और विचारणीय है। जब हम इस पर शांत मन से आत्मचिंतन करते हैं, तो एक सरल सत्य सामने आता है—जब तक किसी व्यक्ति का स्वार्थ हमसे पूर्ण होता रहता है, तब तक वह हमारे साथ मधुर व्यवहार करता है; परंतु जैसे ही उसका स्वार्थ समाप्त होता है, या हम देने योग्य नहीं रहते, वही व्यक्ति अप्रसन्न या नाराज हो जाता है। और यह भी एक सूक्ष्म सत्य है कि नाराज होने वाले बाहर के लोग नहीं होते, बल्कि वही होते हैं जो हमारे अत्यंत निकट और प्रिय होते हैं। यह अनुभव प्रत्येक मनुष्य के जीवन में किसी-न-किसी रूप में अवश्य घटित होता है। इसलिए केवल सबको प्रसन्न करने का प्रयास करना स्थायी समाधान नहीं हो सकता। इसीलिए शास्त्र हमें एक उच्च और शाश्वत मार्ग की ओर ले जाते हैं। श्रीमद्भागवत (आठवाँ स्कंध) का यह अद्भुत श्लोक जीवन का सरल, परंतु गहन रहस्य खोलता है— “पुंसः कृपयतो भद्रे सर्वात्मा प्रीयते हरिः।प्रीते हरौ भगवति प्रीयेऽहं सचराचरः॥”(श्रीमद्भागवत पुराण 8.7.40) भगवान शिव माता पार्वती से कहते हैं—हे भद्रे! जो मनुष्य सबके प्रति कृपा और करुणा का भाव रखता है, उससे सभी के हृदय में स्थित भगवान श्रीहरि प्रसन्न हो जाते हैं। और जब भगवान प्रसन्न होते हैं, तब यह सम्पूर्ण चर-अचर जगत भी उससे प्रसन्न हो उठता है। इस श्लोक का भाव हमें एक अत्यंत सरल, परंतु दिव्य दिशा प्रदान करता है—मनुष्य को सबको प्रसन्न करने का प्रयास नहीं करना चाहिए, बल्कि अपने भीतर दया, करुणा और शुभभाव को विकसित करना चाहिए। यही वह भाव है जो भगवान को प्रिय है। जब मनुष्य इस भाव के साथ जीवन जीता है, तब उसके भीतर एक सहज शांति और संतुलन उत्पन्न होता है। उसका व्यवहार, उसका दृष्टिकोण और उसकी उपस्थिति ही ऐसी हो जाती है कि संबंधों में मधुरता स्वतः आने लगती है। अतः शास्त्र का यह दिव्य संदेश अत्यंत स्पष्ट है—हरि को प्रसन्न करने का प्रयास करें, क्योंकि जब भगवान प्रसन्न होते हैं, तब जीवन में समरसता और संतुलन स्वयं प्रकट हो जाता है। 🌎 यदि यह लेख आपके भीतर चिंतन और जागरण की भावना उत्पन्न करता है, तो आध्यात्मिक, सामाजिक और प्रेरणादायक लेखों के माध्यम से राष्ट्र, संस्कृति, धर्म, शिक्षा और चरित्र-निर्माण के इस सतत चिंतन से जुड़ें तथा नित्य भगवद्गीता प्रश्नोत्तरी में सहभागी बनें —https://www.youtube.com/@Krishnamurti… ✍️ के. कृष्णमूर्ति, श्रीधाम वृन्दावन@KrishnamurtiKOfficial
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April 16, 2026
