विश्व का आध्यात्मिक केंद्र, भगवान श्री कृष्ण की दिव्य लीला भूमि—श्रीधाम वृंदावन—आज जिस स्थिति से गुजर रहा है, वह केवल एक धाम की नहीं, हमारी चेतना की स्थिति को प्रकट करता है। बाहर से आने वाले लोग दर्शन करें, यह आवश्यक है—परंतु क्या वे भाव लेकर आ रहे हैं, या केवल प्रवृत्तियाँ?
भगवान श्री कृष्ण ने गौ माता और बृजवासियों से जो प्रेम किया, वही इस धाम की आत्मा है। अतः जो भी यहाँ आए, वह केवल दर्शक बनकर नहीं, बल्कि श्रद्धा और सम्मान के साथ आए। परंतु आज जब व्यवहार में ही वह भाव कम होता दिखाई दे, तो यह एक गंभीर संकेत है।
और इससे भी अधिक चिंताजनक स्थिति तब बनती है जब संत समाज के भीतर ही चरित्र, आध्यात्मिकता और नैतिकता में गिरावट दिखाई देने लगे। क्योंकि तीर्थ की महिमा उसके स्थान से नहीं, बल्कि वहाँ के आचरण से जीवित रहती है। यदि आधार ही कमजोर हो जाए, तो दिव्यता केवल शब्द बनकर रह जाती है।
यह समय केवल देखने का नहीं, बल्कि जागने का है। जो भी इस धाम से जुड़े हैं—चाहे संत हों, बृजवासी हों या श्रद्धालु—सभी को अपनी भूमिका को समझना होगा।
आज वरुथिनी एकादशी के इस पावन अवसर पर ठाकुर श्री बांके बिहारी लाल जी महाराज के चरणों में यही प्रार्थना है कि वे अपनी कृपा से इस दिव्य ब्रजधाम की पवित्रता, उसकी मर्यादा और उसकी आध्यात्मिक चेतना की रक्षा करें, और हम सभी को ऐसा भाव दें कि हम इस धाम को केवल देखें नहीं, बल्कि उसके अनुरूप जीने का प्रयास करें।
यह केवल वृंदावन का प्रश्न नहीं—यह उस भाव का प्रश्न है, जिससे हम ईश्वर के धाम को देखते और जीते हैं।
🌎 यदि यह संदेश आपके भीतर किसी शांत जागरण को स्पर्श करता है, तो आप इस सतत आध्यात्मिक, सामाजिक और प्रेरणादायक विचार-प्रवाह से जुड़ सकते हैं।
नित्य भगवद्गीता प्रश्नोत्तरी के माध्यम से इस अनुभूति को और गहराई दी जा सकती है —
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✍️ के. कृष्णमूर्ति, श्रीधाम वृन्दावन
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