वैश्विक अभिभावक दिवस (1 जून) पर भारतीय जीवन-दर्शन, संस्कारों की निरंतरता और नैतिक उत्तरदायित्व के मूल तत्वों को टटोलता एक गंभीर वैचारिक विमर्श।
आज 1 जून को विश्व के अनेक देशों में ‘वैश्विक अभिभावक दिवस’ मनाया जाता है। इस अवसर पर माता-पिता और अभिभावकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और प्रेम व्यक्त करने की प्रेरणा दी जाती है। निस्संदेह यह एक अच्छी भावना है।
परंतु एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से मन में उठता है—क्या वास्तव में वर्ष में एक दिन अभिभावक दिवस मना लेने से अभिभावकों के प्रति सम्मान बढ़ जाएगा? क्या किसी संबंध की गहराई केवल एक दिवस के सहारे जीवित रह सकती है? और क्या हमारी भारतीय संस्कृति की परंपरा भी यही रही है?
भारतीय संस्कृति में अभिभावकत्व का व्यापक स्वरूप
इन प्रश्नों पर गंभीरता से विचार करने पर स्पष्ट होता है कि भारतीय संस्कृति की दृष्टि कहीं अधिक व्यापक, गहरी और जीवनोपयोगी रही है। यहाँ अभिभावक का अर्थ केवल माता-पिता तक सीमित नहीं है।
दादा-दादी, नाना-नानी, गुरु, परिवार के वरिष्ठजन तथा वे सभी लोग जिन्होंने हमारे जीवन के निर्माण, संरक्षण और मार्गदर्शन में भूमिका निभाई है, भारतीय परंपरा में अभिभावक माने गए हैं। हमारे यहाँ संबंध केवल रक्त से नहीं, संस्कार और उत्तरदायित्व से बनते हैं।
तैत्तिरीयोपनिषद् का यह प्रसिद्ध वचन भारतीय संस्कृति की आत्मा को प्रकट करता है—
“मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव।” — तैत्तिरीयोपनिषद्, शिक्षावल्ली, अनुवाक 11 (1.11.2)
अर्थात— माता को देवतुल्य समझो, पिता को देवतुल्य समझो और आचार्य को देवतुल्य समझो।
जिस संस्कृति ने माता, पिता और गुरु को देवतुल्य स्थान दिया हो, वहाँ सम्मान किसी एक दिवस का विषय नहीं था। वहाँ तो जीवन का प्रत्येक दिन कृतज्ञता का अवसर माना जाता था।
आधुनिकता की दौड़ और सांस्कृतिक जड़ों का संकट
दुर्भाग्य से आज हम धीरे-धीरे अपनी जड़ों से दूर होते जा रहे हैं। यह केवल युवाओं का दोष नहीं है। जिस पीढ़ी को अपनी संस्कृति का परिचय ही नहीं कराया गया, उससे उसके संरक्षण की अपेक्षा कैसे की जा सकती है?
यदि बच्चों को आधुनिक ज्ञान दिया जाए, पर अपनी परंपराओं का परिचय न दिया जाए, तो वे स्वाभाविक रूप से बाहरी प्रभावों की ओर आकर्षित होंगे।
आज अनेक युवा आधुनिक पहचान में गर्व अनुभव करते हैं। इसमें कोई बुराई नहीं है। समस्या आधुनिकता नहीं है; समस्या तब उत्पन्न होती है जब आधुनिकता के आकर्षण में हम अपनी पहचान भूलने लगते हैं।
जिस वृक्ष की जड़ें कमजोर हो जाएँ, उसकी हरियाली अधिक समय तक नहीं टिकती। यही बात समाज और संस्कृति पर भी लागू होती है।
शिक्षा व्यवस्था और चरित्र निर्माण की चुनौती
सबसे गंभीर चिंता यह है कि आज परिवार, शिक्षा और समाज—तीनों क्षेत्रों में संस्कारों की निरंतरता कमजोर पड़ती दिखाई दे रही है। शिक्षा का उद्देश्य जीवन निर्माण के स्थान पर केवल जीविका तक सीमित होता जा रहा है।
विद्यालय और विश्वविद्यालय कुशल विद्यार्थी तो तैयार कर रहे हैं, पर क्या वे उतनी ही गंभीरता से चरित्रवान, संवेदनशील और कृतज्ञ मनुष्य भी तैयार कर रहे हैं? यह प्रश्न केवल शिक्षकों के लिए नहीं, पूरे समाज के लिए विचारणीय है।
भगवान श्रीकृष्ण भगवद्गीता में कहते हैं—
“देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम्। ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥” — श्रीमद्भगवद्गीता 17.14
अर्थात— देवता, गुरुजन और पूजनीय व्यक्तियों का सम्मान करना शारीरिक तप है।
यदि सम्मान और कृतज्ञता को तप कहा गया है, तो अभिभावकों के प्रति आदर का महत्व सहज ही समझा जा सकता है। परंतु आज सम्मान धीरे-धीरे औपचारिकता में बदलता दिखाई दे रहा है। संबंध बने हुए हैं, पर उनके भीतर की आत्मीयता कमजोर पड़ रही है।
मार्गदर्शन की स्वीकार्यता और विधिक-नैतिक कर्तव्य
भारतीय संस्कृति ने संबंधों को केवल सामाजिक व्यवस्था नहीं माना, बल्कि जीवन के नैतिक और आध्यात्मिक विकास का आधार माना है। गोस्वामी तुलसीदास जी लिखते हैं—
“मातु पिता गुरु प्रभु कै बानी। बिनहिं बिचार करिअ सुभ जानी॥” — श्रीमद्रामचरितमानस, बालकाण्ड, दोहा 76, द्वितीय चौपाई
यहाँ माता-पिता, गुरु और पूजनीय जनों के मार्गदर्शन को जीवन के कल्याणकारी आधार के रूप में स्वीकार करने की प्रेरणा दी गई है।
आज आवश्यकता किसी दिवस का विरोध करने की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम अपनी संस्कृति के मूल भाव को समझें। यदि एक दिन का अभिभावक दिवस हमें कृतज्ञता का स्मरण कराता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। परंतु यह भावना वर्ष के केवल एक दिन तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
श्रीमद्भागवत महापुराण में कहा गया है—
“आचार्यं मां विजानीयान्नावमन्येत कर्हिचित्।” — श्रीमद्भागवत महापुराण, स्कन्ध 11, अध्याय 17, श्लोक 27
अर्थात— आचार्य को मेरा ही स्वरूप समझना चाहिए और कभी उनका अनादर नहीं करना चाहिए।
यह शिक्षा केवल गुरु के लिए नहीं, बल्कि उन सभी लोगों के प्रति श्रद्धा का संदेश है जिन्होंने हमारे जीवन को दिशा दी है।
आत्मचिंतन और भविष्य का मार्ग
समय आ गया है कि हम अपनी अगली पीढ़ी को केवल आधुनिक साधन ही नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति का परिचय भी दें। उन्हें बताया जाए कि भारतीय संस्कृति केवल अतीत की स्मृति नहीं है; यह जीवन जीने की एक परिपक्व पद्धति है। यह कृतज्ञता, संवेदना, परिवार, सेवा, सम्मान और उत्तरदायित्व की संस्कृति है।
सत्य यह है कि दोष केवल युवाओं का नहीं है। यदि बच्चे अपनी संस्कृति से दूर हो रहे हैं, तो इसके लिए अभिभावक, शिक्षा व्यवस्था, सामाजिक वातावरण और आध्यात्मिक नेतृत्व—सभी को आत्मचिंतन करना होगा। नई पीढ़ी वही सीखेगी जो हम उसे देंगे।
यदि हम चाहते हैं कि आने वाली पीठियाँ अपने अभिभावकों, परिवार और समाज के प्रति उत्तरदायी बनें, तो हमें अपने घरों, विद्यालयों और सामाजिक जीवन में पुनः उन मूल्यों को जीवित करना होगा जो हमारी सभ्यता की पहचान रहे हैं।
क्योंकि किसी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति उसकी आर्थिक समृद्धि से पहले उसके संस्कारित परिवारों में निहित होती है। और संस्कारित परिवारों की शुरुआत अभिभावकों के प्रति सम्मान, कृतज्ञता और आत्मीयता से होती है।
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✍️ के. कृष्णमूर्ति श्रीधाम वृंदावन
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